अगर आप ''फाइट फॉर राईट''पर कुछ लिखना चाहते है तो मेंबर बनने के लिए हमे ईमेल करे- right.for.fight@gmail.com पर! साथ ही साथ ऐसे लेखकों से अनुरोध है की वे इस ब्लॉग की मेम्बरशिप के लिए ईमेल न करे जिनका दिल कमजोर हो!!

Website templates

Saturday, April 2, 2011

जय भारत....जय हिन्दुस्तान....
ये जीत भारत के जज्बे की है...अनुशासन की है....और टीम भावना की है.....
इस जीत का सबक यह है कि अगर भारत अन्य क्षेत्रों में भी यही टीम भावना-अनुशासन और जज्बे से काम करे तो वह हर क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर बन सकता है....
भारत के लोगों को चाहिए कि वो देखें कि किस तरह देश के एक होना चाहिए और अपने स्वार्थ त्याग कर भारत के हित में कार्य करना चाहिए....
 भारत....भारत....भारत....भारत.....हर एक जिहवा में यही एक नाम है.....
भारत नाम का यह शब्द कभी मिटने ना पाए.....आईये इस बात का हम सब संकल्प करें.....
भारत की आन-बान-शान को बनाए रखने का हम सब मिलकर प्रयास करें.....
 जश्न----जश्न ....और जश्न .....हर तरफ जोश  ....जूनून  ....हुजूम .....और शोर -शराबा .....
ऐसा मंजर भला कब दिखाई देगा.....जिसे हमारे बच्चे याद रखेंगे.....
 आईये हम सब भी मिलकर कुछ ऐसा करें.....कि अपने-अपने स्तर पर किसी ना किसी प्रकार के धुनी....युवराज....और गंभीर या सचिन बन सकें..
भीड़.....भीड़.....भीड़....बधाईयाँ.....और आने वाले कल की शुभकामनाएं.....
 दुनिया का उभरते हुए भारत का सलाम.....और अन्य देशों को चुनौती.....
मैं अब विकल हूँ इस बात के लिए....कि भारत का जन-जन भारत के लाभ के लिए और इसके गौरव के लिए कार्य करे.....काश कि अब भी हमारे नेताओं को सदबुद्धि आ सके...
क्यूंकि वही देश के गौरव को और उंचा उठाने में देश के जन-जन की मदद कर सकते हैं....
देश के हर नागरिक के लिए जीवन यापन की उचित सुविधाएं अगर ये लोग उपलब्ध करवा सकें.....तो सचमुच भारत सही मायनों में जीत पायेगा,,,,,जय भारत....जय हिन्दुस्तान....



ये जीत भारत के जज्बे की है...अनुशासन की है....और टीम भावना की है.....
इस जीत का सबक यह है कि अगर भारत अन्य क्षेत्रों में भी यही टीम भावना-अनुशासन और जज्बे से काम करे तो वह हर क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर बन सकता है....
भारत के लोगों को चाहिए कि वो देखें कि किस तरह देश के एक होना चाहिए और अपने स्वार्थ त्याग कर भारत के हित में कार्य करना चाहिए....
 भारत....भारत....भारत....भारत.....हर एक जिहवा में यही एक नाम है.....
भारत नाम का यह शब्द कभी मिटने ना पाए.....आईये इस बात का हम सब संकल्प करें.....
भारत की आन-बान-शान को बनाए रखने का हम सब मिलकर प्रयास करें.....
 जश्न----जश्न ....और जश्न .....हर तरफ जोश  ....जूनून  ....हुजूम .....और शोर -शराबा .....
ऐसा मंजर भला कब दिखाई देगा.....जिसे हमारे बच्चे याद रखेंगे.....
 आईये हम सब भी मिलकर कुछ ऐसा करें.....कि अपने-अपने स्तर पर किसी ना किसी प्रकार के धुनी....युवराज....और गंभीर या सचिन बन सकें..
भीड़.....भीड़.....भीड़....बधाईयाँ.....और आने वाले कल की शुभकामनाएं.....
 दुनिया का उभरते हुए भारत का सलाम.....और अन्य देशों को चुनौती.....
मैं अब विकल हूँ इस बात के लिए....कि भारत का जन-जन भारत के लाभ के लिए और इसके गौरव के लिए कार्य करे.....काश कि अब भी हमारे नेताओं को सदबुद्धि आ सके...
क्यूंकि वही देश के गौरव को और उंचा उठाने में देश के जन-जन की मदद कर सकते हैं....
देश के हर नागरिक के लिए जीवन यापन की उचित सुविधाएं अगर ये लोग उपलब्ध करवा सकें.....तो सचमुच भारत सही मायनों में जीत पायेगा,,,,,जय भारत....जय हिन्दुस्तान....




Wednesday, March 23, 2011

य काफिया और रदीफ़ तो हटा दे जाहिद ,ज़रा मेरे हर्फ़ ग़ज़ल में समां जायें !!
जिंदगी का हर लम्हा ही एक मकता है ,हर शै के बाद दूसरी शै ही आ जाए !!
मुश्किलों ने हमसे कर ली है अब तौबा, अब अगर जो वो रास्ते में आ जाए !!
उम्र को ही पैराहन की तरह ओढ़ा हुआ है,मौत जब आए,इसी में समां जाए !!
अब तो तू ही तू नज़र आता है यारब,जहाँ में जहाँ-जहाँ तक मेरी नज़र जाए !!
हम हर्फ़ को ही खुदा समझाते हैं यारा,हर हर्फ़ की ही जद में खुदा आ जाए !!
इक जरा मन को कडा कर लीजिये ,हर फिक्र धूल में उड़ती ही नज़र आए !!
इतनी कड़ी निगाहों से ना देखिये हमें,कहीं खुदा ही घबरा कर ना आ जाए !!
दुनिया में रसूख उसी का होता है,जिसे,रसूख की फिक्र कभी भी ना सताए !!
सिर्फ़ मुहब्बत का भूखा हूँ"गाफिल",प्यार से मुझे कोई कुछ भी खिला जाए !!
किसी के बाप की नहीं है यह धरती....!!  
                 दोस्तों धरती पर रह रहे तमाम लोगों के बारे में यह बात सुस्पष्ट रूप से कही जा सकती है की धरती पर के सारे लोग अंततः धरती का भला चाहते हैं,और तकरीबन हर कोई शायद धरती को स्वर्ग ही बनाना चाहता है,अब यह बात अलग है कि इस सपने को फलीभूत करने के लिए जो कर्म करने होते हैं,उन्हें करना तो दूर,सही तरह से उनपर विचार भी नहीं किया जाता...तो आदमी द्वारा की जाने वाली इस प्रकार की बातें दरअसल एक मज़ाक ही लगती हैं...एक बहुत बड़ा बेहूदा मज़ाक...!!जो धरती के हर एक कोने में लाखों-करोड़ों लोग हर वक्त विलापते रहते हैं....और बड़े सुकून से ठीक उसी वक्त वो धरती का सीना छलनी करते हुए होते हैं....जिस वक्त वो धरती के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हुए होते हैं...और एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि धरती को सबसे ज्यादा छलनी करने वाले या इसे लूटने वाले लोग ही धरती को सुन्दर बनाने की बातें करते हैं,तथा इसे करने के लिए वो तरह के दान-धर्म आदि भी करते हैं...और इस तरह वो दानवीरता के "कर्ण"कहलाये जाते हैं...और धरती के समाज पर उनका प्रभुत्व अन्य लोगों की अपेक्षा और-और-और बढ़ता जाता है...!!
                     दोस्तों जिस तरह हम सब इंसान धरती पर जीने के लिए अपने लिए बेहतर से बेहतर संसाधन चाहते हैं और सुख से जीना चाहते हैं....ठीक उसी तरह धरती भी हमसे ऐसा ही चाहती है,किन्तु धरती मूक है...यह हमसे कभी कुछ नहीं बोलती इसलिए हम यह समझ ही नहीं पाते...दोस्तों धरती पिछले बहुत से समय से आदमी वेदना से तड़प रही है...हमने तरह-तरह के कैंसर से धरती को इतना ज्यादा पीड़ित कर दिया है कि धरती इन घावों से से बुरी तरह छटपटा रही है....किन्तु,चूँकि वह हमसे कुछ नहीं बोलती....सो उसकी तड़प को हम नहीं समझ पाते.....और ना ही अपनी उस माँ,जिसने हमें जन्म देकर पाला-पोषा और बड़ा करके ऐसा बनाया कि हम उसकी गोद में एक बेहतरीन जीवन को अंजाम दे सकें....उस माँ के असीम दर्द को देखने की चेष्टा तक नहीं करते हम सब....और मजा यह कि धरती पर के सबसे श्रेष्ठ जीव भी हम सब मानव ही हैं.....यह स्वनामधन्यता हमारी इस लाचार माँ की पीड़ा और कसक को और भी ज्यादा बढाए देती हैं...!!
                  सबसे पहले तो दोस्तों हमें यह बात और तमीज हमेशा के लिए हमारे जेहन में धर लेनी चाहिए कि यह धरती हम इंसानों में सबके या किसी भी एक के बाप की नहीं है...यह धरती इस पर रह रहे तमाम असंख्य प्राणियों की भी है...जिन्हें हम जानते और नहीं जानते हैं...मगर उफ़ हमने उन असंख्य प्राणियों को धरती पर से ना सिर्फ बेदखल करते जा रहे हैं,बल्कि इस तरह से धरती के बहुरंगी पने को,इसकी विविधता को भी जान-बूझकर मिटाए दे रहे हैं....यह सब महज इसलिए कि हम मानव -जात शान से रह सकें....??किन्तु यहाँ भी हम मानव-जात एक तुच्छ जात ही साबित हुए जाते हैं... क्यूंकि जिस धरती को हम अपने लिए सुख की सेज बनाए रखना चाहते हैं....उसी धरती को अपने सुख और सेज के लिए ना जाने कितने ही अगणित बाशिंदों को भूखे-बेहाल-कंगाल और मरने की हद तक लाचार बनाकर रखा हुआ है...जब कुछ करोड़ लोग इस धरती पर मौज-मठ्ठा/हंसी-ठठ्ठा कर रहे होते हैं....ठीक उसी वक्त अरबों लोग भूख से तड़प रहें होते हैं....पानी के लिए,रोटी के लिए और कुछ अन्य साधनों के लिए आपस में मारामारी कर रहे होते हैं...!!
                 यह बहुत अजीब बात है कि जो धरती किसी एक के बाप की नहीं है,इस धरती का एक छोटा-सा टुकडा भी किसी एक की जागीर नहीं है...उस धरती पर जन्म लेने वाले लोग धरती के टुकड़े- टुकड़े कर बेच-खा रहे हैं....और उन टुकड़ों की खातिर कुत्तों से भी ज्यादा बुरी तरह से लड़-झगड़ रहें हैं...और धरती के इन तरह-तरह के टुकड़ों के लिए खून की नदियाँ तक बहा देने में इन्हें कोई संकोच नहीं है...!!(धरती के कुत्ते मुझे क्षमा करेंगे...आदमी के इस विषय में उन जैसे वफादार जीवों का नाम घसीटे जाने को लेकर मैं सचमुच बेहद शर्मिन्दा हूँ...!!)  
                    दोस्तों...धरती का हर-एक कण हम सबके लिए हैं....जिनका उपयोग हमें हमारे सम्यक जीवन जीने के लिए करना था...और खुद को एक सभ्य जात या प्राणी मानने के (स्वनामधन्य एवं अतिरंजित)गुण के कारण अपने पास के किसी भी एक अतिरिक्त कण को अन्य आदमी को प्रदान कर उसे उसके जीने में सहयोग प्रदान करना चाहिए था....किन्तु बजाय ऐसा करने के हमने धरती के इन तरह-तरह से जीवन-दायिनी और सुख-दायिनी कणों को संपत्ति बनाकर उस संपत्ति को तरह-तरह से अपने पास रखने का दुष्कर्म करना शुरू कर डाला....यह दुष्कर्म आज जिन उंचाईयों तक जा पहुंचा है... कि अरबों भूखे-नंगे लोगों के बीच अरबों डालरों की संपत्ति कमाए हुए लोगों को अपना नाम अमीर लोगों की लिस्ट में देखना बजाय शर्म,एक हेंकड़ी-एक अहंकार-एक गौरव का अहसास करता है...और मजा यह कि धरती पर के ही संसाधनों को अपनी ताकत से अपने हक़ में इस्तेमाल कर अमीर से अमीरतम बने हुए लोगों की हेंकड़ी यह है कि उन्होंने यह सब अपनी बुद्धि से किया है...एक मजेदार बात है यह कि आदमी अपनी अपनी बुद्धि का उपयोग सिर्फ और सिर्फ अपने लिए धन-संपत्ति और बल पैदा करने और उसे और बढाते जाने के लिए करता है.....दूर के लोगों की बात तो छोडिये...उसके खुद के सगे-सम्बन्धी भी भूखे हो सकते हैं....और फिर भी ऐसे लोगों का सम्मान समाज में तनिक भी कम नहीं होता...!!
                  दोस्तों इस धरती पर हर जगह बुद्धि का परचम लहरा रहा है....और अपना धन या ताकत इसलिए सबको वाजिब प्रतीत होता है,क्यूंकि बुद्धि द्वारा स्थापित तर्क इसे सही साबित हैं करते हैं...यह अहंकार कि यह सब मैंने अपने कर्म और बुद्धि से पाया है....यहाँ यह बात गायब कर दी जाती है कि ज्यादातर यह हासिल वाजिब या न्याय-संगत तरीकों से ना होकर शाम-दाम-दंड-भेद-तीन-तिकड़म- छल-कपट यहाँ तक कि धूर्तता-मक्कारी से किया गया होता है....ऊँचे दर्जे का यह कपट हमारी व्यवस्था से मान्यता प्राप्त होता है....क्यूंकि हम व्यवस्था के विभिन्न तरह के लोग या कल-पूर्जे इसी तरह से अपना पोषण "ग्रीस-मोबिल"आदि प्राप्त करते हैं....हमारी मिलीभगत से हम सब जो,जिस भी किस्म के उद्योग-धंधे या व्यापार में शामिल होते हैं....इस मिलीभगत से अपने कुछ लोगों को प्रश्रय देते हैं....बाकी सबको बाहर कर देते हैं...!!इस तरह से हमारे कुछ लोगों का समूहीकरण अंततः धरती की सामूहिकता को नष्ट करते जाते हैं...क्यूंकि धरती की सामूहिकता उसकी प्रकृति में व्याप्त जीवनोनुकुल नासर्गिकता है जो सबको जीने के व्यापक अवसर प्रदान करती है....जबकि हम मानव प्रत्येक प्राणी के लिए मौजूद इन अवसरों को अपने स्वार्थजनित कुप्रयास-कुप्रबंधन द्वारा तोड़ते चले जाते हैं....!!
                हमारे द्वारा किये जाने वाले ऐसे प्रयासों के कारण धरती भीतर से खोखली और बाहर से हरीतिमा-विहीन,प्रदूषित और ना जीने लायक होती चली जा रही है.....और इसे इस हालत तक लाने की जिम्मेवार ताकतें ही इसकी मानव-जाति का नेतृत्व कर रही हैं,किये जा रही हैं...करती जाएंगी...!!
बुद्धि के साथ विकास के कुप्रबंध का कोई उदाहरण देखना हो तो यह पृथ्वी के हर उस कोने में देखा जा सकता है,जहां भी आदमी नाम का जीव मौजूद है...जो अपने सिवा धरती के हर एक चीज़ को मते दे रहा है....और अपने में से भी कमजोर लोगों को मते दे रहा है....पता नहीं ऊपर वाले ने आदमी को बनाए जाते समय इस भयावह समय की कल्पना की थी या नहीं...मगर अगर धरती आज जीने योग्य साधनों से रिक्त होती जा रही है तो उसका कारण महज आदमी का अतिलालच-अतिअहंकार-अतिस्वार्थ और अतिबुद्धिवादिता है....और आदमी ही यह समझता नहीं....अपनी अतिबुद्धिवादिता के ही कारण...जहां-जहां ही अति बुद्धिनिष्ठ है...वहां-वहां उसने धरती पर के संसाधनों और मानव तथा प्राणिजगत के जीवनोपयोगी साधनों पर कब्जा जमाये हुए है...और ऐसा करना चूँकि वह अपनी बुद्धि के बूते हुए होना मानता है...इसलिये उसे अपनी यह बपौती ना सिर्फ वाजिब बल्कि यही सही है,ऐसा लगता है उसे...!! 
                  दोस्तों पढ़े-लिखे और सभ्य होने का अगर सिर्फ धन कमाने और इस धन कमाने के लिए दूसरों का हक़ छीनना भर है....तो लानत है इस सभ्यता पर...तो फिर छोडिये भी धरती को स्वर्ग बनाने के कपट-भरे विचार को और यह कहिये कि हम सिर्फ अपने लिए ऐसा कहते हैं और अपने लिए ही ऐसा करना भी चाहते हैं....तो ज्यादा ईमानदारीपूर्ण होगा और मानवीयता के ज्यादा करीब भी... किन्तु एक और तो मानवता की बातें....और दूसरी तरफ सिर्फ व् सिर्फ तमाम अमानवतापूर्ण कृत्य यह हमारे चरित्र को बिलकुल भी शोभा नहीं देते....अगर हम यह मानते हैं कि हम तनिक भी चरित्रवान हैं...और हाँ यह भी सही है कि हम आगे भी ऐसा ही करते रहने वाले हैं....तो फिर दोस्तों आज से यह सब बातें बंद.....!!क्या बंद....??धरती को स्वर्ग बनाने की बातें या इसके पर्यावरण के नष्ट होते जाने की चिंता भरी बातें......!!आप बस अपना काम किये जाओ....जो भोगना है.....हमारी संताने भोग लेंगी ना.....अपन को चिंता काहे को लेने की.....!!!!

Wednesday, March 16, 2011


ओह जापान....तुम फिर से वैसे ही सुन्दर बन जाओ....!! 
                 जो कुछ घट रहा होता है हमारे सामने,उससे विमुख हम कभी नहीं रह सकते...बहुत बार बहुत सी बातों पर हमारी आँखे भर-भर आती हैं...मगर कुछ भी हमारे बस में नहीं होता हम बस तड़प कर रह जाते हैं...जापान की विभीषिका एक ऐसी ही दुर्घटना है...जिस पर अपने भाईयों के लिए सिवाय मंगलकामनाएं और शुभकामनाएं प्रेषित करने के कुछ नहीं कर सकते...धरती पर जापान नाम की इस जगह के हमारे तमाम भाई बंधू जल्द-से-जल्द इस त्रासदी के परिणामों को झेल कर आने वाले कल में एक बार फिर एक सुन्दर-मजबूत और अकल्पनीय जापान के निर्माण को अग्रसर हों,ऐसी हमारी कामना है....हमारे जापानी भाईयों,विपदा की इस अभूतपूर्व घडी में हजारों मील दूर बैठे हम सब आपके साथ हैं...!!!!

Friday, March 11, 2011

सपने में भी रोकती है बेटियाँ....!!
एक बिटिया दस वर्ष की हो गयी है मेरी 
और दूसरी भी पांच के करीब....
कभी-कभी तो सपने में ब्याह देता हूँ उन्हें 
और सपने में ही जब 
जाता हूँ अपनी किसी भी बेटी के घर....
तो मेरे सीने से कसकर लिपट कर 
खूब-खूब-खूब रोती हैं बेटियाँ....
मुझसे करती हैं वो 
खूब-खूब-खूब सारी बातें....
अपने घर के बारे में 
माँ के बारे में और 
मोहल्ले के बारे में...
और तो और कभी-कभी तो 
ऐसी-ऐसी बातें पूछ डालती हैं 
कि छलछला जाती हैं अनायास ही आँखे 
और जीभ चुप हो जाती है बेचारी...
पता नहीं कितने तो प्यार से 
और पता नहीं कितना तो..... 
खाना खिलाये जाती हैं वो मुझे....
और जब चलने लगता हूँ मैं 
वापस उनके यहाँ से....
तो एक बार फिर-फिर से...
खूब-खूब-खूब रोने लगती हैं बेटियाँ 
कहती हैं पापा रुक जाओ ना....
थोड़ी देर और रुक जाते ना पापा....
कुछ दिन रुक जाते ना पापा....
पापा रुक जाओ ना प्लीज़...
हालांकि जानती हैं हैं वो 
कि नहीं रुक सकते हैं पापा.....
मगर उनकी आँखे रोये चली जाती हैं....
और पापा की आँख सपने से खुल जाती है....
देखता हूँ....बगल में सोयी हुई बेटियों को....
छलछला जाता हूँ भीतर कहीं गहरे तक...
चूम लेता हूँ उनका मस्तक....
देखता हूँ....सोचता हूँ...बहता हूँ....
कि उफ़ कितनी गहरी जान हैं मेरी बेटियाँ....!!!

-- 
http://baatpuraanihai.blogspot.com/

Wednesday, March 9, 2011

सुनो....सुनो.....सुनो....सुनो.....
ओ देवियों....
ओ संसार की तमाम नारियों...
बालाओं...कन्याओं....
इस,बीते महिला-दिवस के बाद...
तुम्हारे ऊपर अब किसी पुरूष का
कोई अत्याचार नहीं होगा....
संसार-भर के मीडिया में
महिला-दिवस के प्रचारित होने के बाद
सहम गया है संसार-भर का पुरुष....
और कसम खा ली है उसने कि....
अब नहीं करेगा वह नारी का अ-सम्मान
तो हे सम्पूर्ण नारियों....
अब विश्व-विजेता हो तुम...
और अब आगे चलेगी तुम्हारी ही मर्ज़ी
अब चार साल से बारह साल की बच्चियां
नहीं फ़ेंक दी जायेंगी कहीं कुकर्म के बाद...
और किसी चलती लड़की पर,
कभी तेज़ाब नहीं फेंका जाएगा....
अब कोई अरुणा नहीं पड़ी रहेगी....
सैतीस साल तक किसी अस्पताल के बिस्तर पर...
और ना ही पच्चीस सालों तक लड़ना पडेगा,
किसी भंवरी देवी को कचहरी में न्याय....!!
कोई किसी नारी को जीते-जी....
किसी तंदूर में नहीं भूनेगा....
और ना ही कोई आरूषी अपने ही माँ-बाप से
ह्त्या का शिकार बन पाएगी.....
और तो और अपने इस भारत में
अब कहीं कोई दहेज़-ह्त्या नहीं होगी....
यहाँ तक कि किसी मनचले की किसी....
छेड़खानी का शिकार भी नहीं बनेगी कोई लड़की....
और रात को अकेले चल सकोगी तुम सब भयहीन,सड़कों पर
और सारे पियक्कड़ और क्रोधी पति भी आठ मार्च के बाद
अपनी स्त्री को अपने जुल्म का शिकार नहीं बनायेंगे...
और ना ही अब समझी जायेगी किसी स्त्री की योनि...
अपनी तिजोरी के धन या जमीन की भांति अपनी मिलकियत
हे दुनिया की तमाम देवियों...
कितनी आशावादी हो ना तुम सब....
अब तो मैं भी तुम सबकी तरह इस आशा का शिकार हो चुका हूँ
ऐसा लगता है कि किसी(ब्राहमण) ने ठीक ही कहा है....
कि साल अच्छा है.....(चाहे बरसों पहले....!!)
आठ मार्च के बाद ऊपर लिखा हुआ ही होगा....
यानी कि कोई जोर और जुल्म नहीं होगा तुमपर....
यह सब होगा और जरूर होगा.....मगर....
तुम सबकी मृत्यु के पश्चात.....!!
(अभी-अभी आज के प्रभात-खबर में पढ़ा कि बीती रात
या दिन बारह साल की एक बाला को
कुकर्म करके हत्या कर खेत में फ़ेंक दिया गया) 

--
http://baatpuraanihai.blogspot.com/



Sunday, February 13, 2011

एक बात कहूँ मैं तुमसे......??
अभी-अभी लाए हो ना तुम पूरे सौ रुपये की किताबें...
और कल ही डांट दिया था मुझे पच्चीस रुपयों की टॉफियों के लिए....
जो बच्चों के लिए लायी थी मैं,और तुमने कहा कि देखकर खर्च किया करो !!
मन मसोस कर रह गयी थी मैं,मगर कुछ कह ना पायी,क्योंकि 
कमाकर लाने वाले तो तुम हो,कैसे कमाया जाता है,यह हम क्या जाने 
अक्सर यह जताते हो हमपर तुम,और हम सचमुच शर्मिन्दा हो जाते हैं उस वक्त 
कमाकर लाना सचमुच आसान तो नहीं है बहुत,मगर बार-बार यह जतलाना तुम्हारा
हमें बहुत-बहुत-बहुत पीड़ित कर डालता है,यह शायद तुम कभी नहीं जान पाते....
क्योंकि उस वक्त हमारे तकरीबन भयभीत मुख तुम्हें ताकत प्रदान करते हैं....
और तब तुम और-और-और हावी हो जाते हो हमपर.....तुम ऊँचे...हम बौने....!!
लेकिन एक बात कहूँ मैं तुमसे...यदि तुम सचमुच तहे-दिल से सुन सको...??
अक्सर घर खर्च मांगती हुईं हम स्त्रियाँ अपने पतियों से "घूरी"जाती हैं....
या लगभग लताड़ ही जाती जब अपने बच्चों या सास-ससुर के सन्मुख....
तब ऐसा लगता है कि यह पैसा हम घर खर्च के लिए नहीं बल्कि....
अपनी ऐश-मौज-मस्ती वगैरह के लिए ले रही होंओं....
और मज़ा तो यह कि हम इसका हिसाब बताने लगें तो कहोगे 
कि तुमसे हिसाब भला कौन मांग रहा है...कि नौटंकी कर रही हो....
और हिसाब ना देन...तो ताने मिलते हैं...कि कोई हिसाब ही नहीं है हमारा....!!
हमारी इन तकलीफों को कभी किसी के द्वारा समझा ही नहीं गया है...
मगर हम किस तरह की कुंठा में जी रही हैं,यह बता भी नहीं सकती पति से...
यह व्यवस्था तो हम सबने मिलकर ही बनायी है ना...
कि हम घर में काम करें और तुम सब कमाकर लाओ....!!
तुम घर चलाने का इंतजाम करो और हम घर चलायें....!!
फिर दिक्कत किस बात की है...क्यूँ भड़कते तो तुम बात-बात पर...
और ख़ास कर खर्च की बात पर....
तुमसे पैसे लेकर क्या हम किसी बैंक के लॉकर में रख डालती हैं,अपने निजी खाते में...
या कि तुम्हारे या अपने बच्चों का कोई इंतजाम करती हैं....!!
सच तो यह है कि अपने बच्चो और तुम्हारी खुशियों के सिवा 
हमें कुछ ख्याल तक भी नहीं आता...और तुम्हारे मर्मान्तक प्रश्न...
हमें कहीं बहुत-बहुत-बहुत भीतर तक घायल कर देते हैं अक्सर....!!
काश तुम्हें कभी कोई यह बता सके कि हम भी तुम्हारी तरह ही एक (जीवित)जीव हैं 
और तुमसे एक ऐसा अपनापन चाहिए होता हैं हमें....
कि हम तुममें छिपकर कोई सपना बुन सकें....
और यदि कोई बात बुरी लगे तो तुमसे लिपटकर जार-जार रो सकें...
काश तुम कभी किसी तरह से यह जान सको कि.....
तुम पति के बजाय एक दोस्त बन सको हमारे....
तो हमारी गलतियां हमारे लिए कभी पहाड़ ना बन सकें....
और हम जी सकें एक-दूसरे के भीतर रमकर....
और बच्चों को दिखा सकें प्रेम के तरह-तरह के रूप 
हम सब बन सकें हम सबके बीच आश्चर्य का प्रतिरूप...!!  


http://baatpuraanihai.blogspot.com/