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Sunday, June 6, 2010

इस कोढ़ में कितनी खाज है!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
दोस्तों,जब से झारखण्ड बना....इसे लेकर ना जाने कितने स्वप्न आँखों में जले और देखते ही देखते बुझ भी गए....लेकिन आखों के सपने ऐसे हैं कि कभी ख़त्म ही नहीं होते...और मुश्किल यह है कि कभी पूरे भी नहीं होने को आते....झारखण्ड का हर नागरिक जैसे सलीब पर चढ़ा अपनी आखिरी साँसों के खत्म होने का इंतज़ार कर रहा है...क्यूंकि हालात ऐसे हैं कि किस-किस बात पर आन्दोलन किये जाएँ...प्रशासन और मंत्रालय का कोई भी हिस्सा अपने कार्य को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं है...और मज़ा यह कि सब-के-सब "चोट्टे-सूअर-मवाली-हरामखोर-राज्य और देश-द्रोही"लोग मलाई भी मार रहे हैं और मालामाल भी हुए जा रहे हैं...और काम के नाम पर सिर्फ-और-सिर्फ माल खाने का काम हो रहा है....इस राज्य के एक-एक नागरिक का एक-एक दिन एक तरह की वितृष्णा के साथ गुजर रहा है...और मुझे संदेह है कि जाने कब यह सब किसी भी क्षण एक अनियंत्रित हिंसा में बदल जाए....और जब ऐसा होगा...तब शायद किसी दंगे की तरह नेताओं और उनके चमचों-गुर्गों को चुन-चुन कर मार डाला जाए.....ऐसा अभी से दीख पड़ रहा है.....ऐसे ही विचार वर्षों से दिलो-दिमाग में आते रहते हैं....कि अगर अब भी यह सब नहीं रुका तो न जाने कब राज्य का हरेक नागरिक ही नक्सली बन जाएगा....और.........


ये किन मक्कारों का राज है
इस कोढ़ में कितनी खाज है!!
पता नहीं क्या होना है अब
ये किस भविष्य का आज है !!
कि नेता हैं या कुत्ते-बिल्लियाँ
छील रहे हैं कितनी झिल्लियाँ !!
झारखण्ड को छला है जिन्होंने
क्या दी जाए इसकी उनको सज़ा ??
ये कौन से लोग हैं कि जिनको
मादरे-वतन की कीमत का नहीं पता....
ये कौन से लोग हैं कि जिनको
चमन की जीनत का नहीं पता....
अगर कुछ भी नहीं पता इन्हें तो फिर
किस तरह हम पर ये कर रहे हैं राज....
और क्यूँ नहीं हो रही हमें कोई भी खाज ??
उट्ठो कि ऐसे लोगों को भून दें हम आज
उट्ठो और कहो कि ऐसे लोगों का ये चमन नहीं !!
ऐसे लोगों को दोस्तों कह दो हमेशा के लिए.....
नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं......
और अगर नहीं माने फिर भी ये अगर तो फिर
ख़त्म कर दो इन्हें अभी यहीं की यहीं....
बहुत हो गया दोस्तों कि अब तो खड़े हो जाओ
बच्चों की तरह मत जीओ,अब बड़े भी हो जाओ !!
जिनके लिए बनाया गया है यह झारखण्ड
उन्हीं को किये जा रहे हैं सब खंड-खंड
रण ही अगर लड़ना है तो कमर कस लो सब-के-सब
ये नहीं मानेंगे साले बातों से कुछ भी नहीं अब
तुम्हें मेरे दोस्तों दरअसल कुछ करना नहीं है अब
बस अबके पहचान लो इन सब "कुत्तों"को.....
बस अबके चुनाव में जमा-जमाकर कसकर....
कई लात मार देना इन सभी के चूतडों पर....
कि फिर कभी दिखाई ना दें ये गलती से भी
झारखंड के किसी भी किस्म के परिदृश्य पर....
ये किन कमीनों को पहना दिया हमने गलती से ताज है
अब किस मुहं से कहोगे कि तुम्हें झारखंड पर नाज है !!
दोस्तों ये कविता नहीं है ये तुम्हारे भड़कने का आगाज है
अभी सब कुछ मर नहीं गया है...
अभी तुम्हारे सामने बहुत बड़ी परवाज़ है.... !!!

Saturday, April 24, 2010

bhoot ka parichya.....................

पिघलता जा रहा हूँ, ये क्या हो रहा है मुझे ?

ओ सूरज,मैं आँख-भर नहीं देख पाता तुझे !!

मैंने किसी के दुःख में रोना छोड़ दिया अब

कितने ही गम और परेशानी हैं खुद के मुझे !!

दिन से रात तलक खटता रहता हूँ बिन थके

उम्र गुजरने से पहले कहाँ है आराम मुझे !!

ना जाने किन चीज़ों के पीछे भाग रहा हूँ

उफ़ ना जाने ये क्या होता जा रहा है मुझे !!

किसी जगह टिक कर रोने को दिल है आज

ऐसा क्यूँ हो जाता है अक्सर''गाफिल''मुझे !!..

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किसी शै समझ नहीं पता की क्या करूँ

किसी के कंधे से जा लगूँ और रो पडूँ !!

जिन्दगी अगर इसी को कहते हैं तो फिर

इसी वक्त मर जाऊं,अपनी लाश दफना दूँ !!

कोशिशें,नाकामियाँ,गुस्सा और नफरत,उफ़

घुट-घुट कर रोता रहूँ और बस रोता रहूँ !!

ऊपरवाले का होगा कई सदियों का इक बरस

मैं क्यूँ पल-पल,कई-कई सदियाँ जीता रहूँ !!

इतना हूँ बुरा तो वक्त मार ही दे ना मुझे

उम्र की किश्ती के साथ किनारे जा लगूँ !!

बहुत तड़पती हैं ये धडकनें दिल के भीतर मेरे

दिल को निकाल कर फेंक दूं बेदिल ही जिया करूँ !!

मैं अपने-आप से भाग भी जाऊं तो जाऊं कहाँ

इससे तो अच्छा है कि खुद में ही गर्क हो रहूँ !!

कई दिनों से सोचा था खुद के बारे में कुछ लिखूं

अपने हर इक हर्फ़ में मैं कुत्ते की मौत मरता रहूँ !!

uuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu

uuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu

मेरा परिचय :

नाम : राजीव कुमार थेपड़ा [वर्मा]

पिता : स्व किशन वर्मा

जन्म-तिथि :24 सितम्बर 1970

शिक्षा :बी ए आनर्स [दर्शन-शास्त्र]

रूचि :रंगमंच,गायन,लेखन तथा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय [था]

विशेष :1997 में इन्डियन फ़िल्म एन्ड थियेटर अकादिमी [दिल्ली] के टापर

अभिनय-गायन-लेखन-निर्देशन में सैंकड़ों मंचन

पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा प्रकाशित

चंडीगड तथा इलाहाबाद से सुगम तथा शास्त्रीय संगीत में संगीत-प्रभाकर

इन सभी क्षेत्रों में कई पुरस्कार

आकाशवाणी रांची के कलाकार

मगर फ़िलहाल पैकिंग मैटेरियल के व्यापार में सक्रिय [सभी शौक जो ऊपर उल्लिखित हैं,उनसे किनारा !!]

कार्यालय : प्राची सेल्स

नोर्थ मार्केट रोड

अपर बाजार,रांची

सम्पर्क : 09934305251/093060035/0651-3042630..

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Sunday, April 4, 2010

koi sheershak nahin...........

पता नहीं अच्छाई का रास्ता इत्ता लंबा क्यूँ होता है...!!
पता नहीं अच्छाई को इतना इम्तहान क्यूँ देना पड़ता है !!
पता नहीं सच के रस्ते पर हम रोज क्यूँ हार जाया करते हैं !!
पता नहीं कि बेईमानी इतना इठला कर कैसे चला करती है !!
पता नहीं अच्छाई की पीठ हमेशा झूकी क्यूँ रहा करती है !!
उलटा कान पकड़ने वाले इस जमाने में माहिर क्यूँ हैं !!
बात-बात में ताकत की बात क्यूँ चला करती है !!
तरीके की बातों पर मुहं क्यूँ बिचकाए जाते हैं !!
सभी जमानों में ऐसा ही देखा गया है,
कौए को तो खाने को मोती मिला करता है,
और हंस की बात तो छोड़ ही दें ना....!!
हर बार हमने देखा है कि सच की जीत ही होती है,
मगर तब तक क्या बहुत देर नहीं हो चुकी होती ??
जिन्दगी भर अच्छाई अपनी जगह से निर्वासित रहे,
और अंत के कुछ दिनों के लिए ताज मिल भी जाए तो क्या है !!
फिर सच को इस तरह से जीतने की खाज ही क्या है !!
क्या हम अभिशप्त हैं ता-जिन्दगी राक्षसों का नर्तन देखने के लिए ??
चिता पर कोई देवता तब आ भी जाए तो क्या है !!
दुनिया अगर स्वर्ग होने के लिए ही है,
तो नरक का ऐसा भयंकर कोढ़ बहुत जरूरी है क्या ??
कोई कुंदन होने के लिए जीवन भयंकर भर आग में जलता रहा करे !!
फटी-फटी आँखों से वह यह सब नारकीय-सा देखता रहा करे !!
शान्ति के लिए युद्ध, ऐसा भी क्यूँ लाजिमी होता है ??
शान्ति पाने के आदमी अपना सब-कुछ क्यूँ खो देता है ??
तब भी शान्ति मिल ही जाए यह कोई ऐसा जरूरी भी नहीं !!
शान्ति के ऐसे यज्ञ के आयोजन का प्रयोजन भी क्या है !!
हम किस बात के लिए पैदा हुआ करते हैं ??
धरती को अपने शरीर का मल और इंसान को,
अपने विचारों की हिंसा का मल प्रदान करने के लिए ??
अगर ऐसा ही है तो हमारा होना ऐसा भी क्या जरूरी है ??
और अगर हम ही ऐसे हैं तो -
खुदा जैसी किसी को हमारे बीच लाना जरूरी है क्या ??

http://baatpuraanihai.blogspot.com/

Tuesday, March 30, 2010

हे दुनिया की महान आत्माओं...संभल जाओ....!!

हे दुनिया की महान आत्माओं...संभल जाओ....!!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
मेरी गुजरी हुई दुनिया के बीते हुए दोस्तों.....मैं तो तुम्हारी दुनिया में अपने दिन जीकर आ चूका हूँ....और अब अपने भूतलोक में बड़े मज़े में अपने नए भूत दोस्तों के साथ अपनी भूतिया जिन्दगी बिता रहा हूँ....मगर धरती पर बिताये हुए दिन अब भी बहुत याद आते हैं कसम से.....!!अपने मानवीय रूप में जीए गए दिनों में मैंने आप सबकी तरह ही बहुत उधम मचाया था....और वही सब करता था जो आप सब आज कर रहे हो....और इसी का सिला यह है कि धरती अपनी समूची अस्मिता खोती जा रही.... अपने वातावरण से बिलकुल मरहूम होती जा रही है....इसके पेड़-पौधे-नदी-जंगल-तालाब-पहाड़-मौसम और वे तमाम चीज़ें जिनसे हमारा जीवन सुन्दर-प्यारा-रंगीला और सुकुनदायक बनता है उन्हें हम सबने पागलों की तरह ऐसा इस्तेमाल कर डाला,कि ये सारी नेमतें धरती से समय से पूर्व ही नष्ट हो चली हैं,यहाँ तक कि इसके तरह तरह के जीवनदायक मौसम जो हमें आनंद प्रदान करते थे....आज हमें तनाव प्रदान कर रहे हैं.....हम सबने अमीर-अमीर और अमीर बनने के लालच में धरती के समूचे संसाधनों को भुक्खड़ों की तरह गपचा डाला....और बड़े-और बड़े-और बड़े होने के अहंकार को पुष्ट करने के लिए हम सब प्रकार के संसाधनों को यूँ गप्प करते चले गए जैसे कि किसी और को इन सब चीज़ों की कोई आवश्यकता ही नहीं....अपनी ताकत से हर ताकतवर ज्यादा से ज्यादा संसाधन हजम करता गया....इसके एवज में कम ताकतवर इंसान इसका हर्जाना भरता गया.....एक अमीर की अमीरी के पीछे हज़ारों गरीब की गरीबी बढती गयी.....!!
एक ही शरीर....एक ही चेतना....एक ही सृष्टि के सबसे होनहार माने जाने वाले जीव ने अपने जीवन को सहज बनाने की खातिर बाकी हर किसी का जीवन जीना दूभर कर दिया...इतना ही नहीं अन्य मानवेत्तर जीवों की सभी प्रजातियों को भी अपने पागलपन का शिकार बनता गया....हर एक जीव-सजीव-निर्जीव इसके अंतहीन लालच का शिकार बन अकाल काल-कलवित होता गया....सभी चीज़ें एक-एक कर नष्ट होती गयी....होती गयी....होती गयी....धरती रंगों से....या कि जीवन से रंगहीन होती चली गयी....और आज....??....आज हालत यह बन चुकी है कि खुद मानव को को अपना जीवन जी पाना दूभर लगने लगा है...क्योंकि मानव की बनायी हुई हर एक वस्तु से मानव का जीवन देखने में संवरता ही दीखता है....मगर दरअसल उसका जीवन पल-प्रतिपल ख़त्म होता जा रहा है....आदमी के जीने की गति को तेज करने वाले तमाम साधनों से धरती के मरने की गति उससे भी तेजी से बढती जा रही है....अब तो ऐसा लगने लगा है कि धरती की जिन्दगी सौ-पचास वर्ष भी नहीं बची है......!!उससे पहले ही यह ख़त्म हो जायेगी....अपने संग अंतहीन प्राणों की जान लेकर.....!!
मेरी गुजरी हुई दुनिया के वर्तमान प्यारे-प्यारे दोस्तों.....मैं तो अब मर चूका हूँ....इसलिए मैं इस धरती के लिए सिर्फ दुआ ही कर सकता हूँ....!!लेकिन दवा करना तो तुम जिन्दा इंसानों के हाथ में ही है....!!क्या अब भी तुम अपना लालच कम करने को तैयार हो....??क्या तुम्हारा जीवन सिर्फ तुम्हारे पेट की भूख को शांत करके नहीं जीया जा सकता....??क्या ऊँचे-ऊँचे ख्वाब देखना और उन्हें पूरा करने के लिए पागलपन की इन्तेहाँ तक चले जाना और सबका जीवन जीवन मुहाल कर देना ही मानव जीवन का ध्येय है......??क्या रसूख-अहंकार-और कथित बड़प्पन की चाह ही मानवीयता की निशानी है....??
धरती की हे तमाम महान आत्माओं तुम्हारे जीने के इन्ही तथाकथित मकसदों की वजह से तुम जीवन के इस विनाशक मोड़ पर आन पहुंचे हो और अगरचे अब भी यही सब धत्त्करम करते रहे तो याद रखो कि जल्द ही तुम सब ख़त्म हो जाने वाले हो....ये सही है है कि मरना तो सबको ही है मगर जिस तरह से जिस दिशा में जाकर और जिस-जिस तरह के करम करके तुम मरने को तत्पर हो वह शर्मनाक ही नहीं बल्कि निंदनीय भी है....क्या ये बातें तुम तक पहुँच रही हैं....क्या ये बातें तुम सब समझ पा रहे हो....क्या सचमुच तुम्हारे पास वह समझ है जिसके कारण तुम अपने-आप को सृष्टि के बाकी जीवों से महान और बड़ा साबित किये हुए हो ....हालाँकि किसी और ने ये उपाधियाँ तुम्हें नहीं दी हैं बल्कि तुमने खुद ही खुद को दुनिया का खुदा घोषित किया हुआ है यह बात तो खुद में ही बहुत बड़ा मज़ाक है कि कोई खुद ही खुद को सबसे बड़ा-सबसे तेज़-सबसे आगे घोषित कर दे......खैर ये तो दूसरी बात हुई....तुम्हारे लिए अहम् बात अब यही है कि कि अभी तुरत से ही तुम सब संभल जाओ....नेकनीयत बन जाओ....."आदमी" हो जाओ.....क्यूंकि अपनी जिस संतान के लिए तुम जीवन जीते हो....उस संतान के बारे में ही ज़रा सोच लो तो समझ सकोगे कि जो धरती तुम अपने बाद छोड़ कर जाने वाले हो वह जीने के लिए नहीं बल्कि मरने के लिए है....

Monday, February 15, 2010

वेलेण्टाइन डे के दिन भगवान को प्यारे हो गये पांच किसान


विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आ रही है. रविवार को भले ही पुणे विस्फोट के कारण वेलेण्टाइन डे का शोर न हुआ हो लेकिन महाराष्ट्र के ही विदर्भ इलाके में इसी िदन पांच किसानों ने आत्महत्या कर ली.
विदर्भ के किसानों पर काम करनेवाली संस्था विदर्भ जन आंदोलन समिति द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि 14 फरवरी को पांच किसानों ने आत्महत्या कर ली. इन किसानों के नाम हैं- सुनील देशमुख, नेर (यवतमाल), सचिन लोखण्डे, केवलत (अमरावती), बालकृष्ण वाखोडे, दानापीर (अकोला), मनकारा बाई, अंटारी (अकोला) और गुलाबराव, बुल्ढाणा के किसान हैं. समिति द्वारा जारी विज्ञप्ति में आत्महत्या के कारणों के बारे में बताया गया है कि पूरा विदर्भ सूखे की चपेट में है और पूरे विदर्भ में किसान आत्महत्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. पिछले पांच दिन में 16 किसान आत्महत्या कर चुके हैं जो अमरावती, बुल्ढाणा, अकोला और वर्धा के हैं.
विदर्भ के 14000 गांव सूखे की चपेट में हैं और सरकारी सहायता पूरी तरह से निल है. विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी का कहना है कि किसानों की खेती चौपट हो गयी है और उनके लिए खाने पीने का कोई इंतजाम नहीं है. न तो पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था हो पा रही है और न ही इंसानों के लिए भोजन की. किशोर तिवारी का कहना है कि इस साल की परिस्थितियां 2006 की स्थिति से भी भयानक है जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विदर्भ का दौरा किया था. किशोर तिवारी का कहना है कि इतनी विषम परिस्थिति होने के बावजूद सरकार का इस समस्या की ओर कोई ध्यान नहीं है.
विदर्भ में सूखे की चपेट में अब तक 40 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं. समिति का कहना है कि यह आंकड़ा तो सरकारी है, वास्तविकता इससे और अधिक भयानक है.

Friday, February 12, 2010

सलीम ख़ान के पत्रकार भाई समीउद्दीन नीलू (यू पी पुलिस द्वारा उत्पीड़ित) को मानवअधिकार आयोग से राहत, यू पी सरकार को ५ लाख मुआवजा देने का निर्देश

बचपन से सुना करते थे कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नहीं ! लेकिन देश के मौजूदा सड़े हुए तंत्र में जिस तरह से आम जनता का भरोसा उठ गया है वह भी एक गंभीर समस्या ही है. समीउद्दीन नीलू उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले में विगत एक दशक से ज़्यादा समय से हिंदी दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला में बतौर संवाददाता अपनी सेवा कर रहें हैं. शीर्षकान्तर न हो इसलिए मैं यह बताना चाहूँगा कि कैसे मेरे भाई को यूपी की बल्कि लखीमपुर-खीरी की एस पी 'पद्मजा' ने अपने सरकारी पॉवर का दुरुपयोग करते हुए मानवता के क्रूरतम, तंत्र के दुष्टतम कृत्य को मात्र अपने गलत व समाज विरोधी कार्यों को छिपने के उद्देश्य से, जान से मारने की कोशिश (एनकाउन्टर) की और अपने नीचे कार्य करने आले पुलिस वालों की सहायता के ज़रिये उन्हें वन्य जीव अधिनियम के केस में फ़र्ज़ी तरीक़े से जेल भिजवा दिया.

लेकिन कहते हैं कि सांच को आंच नहीं, बस कुछ ऐसा ही हुआ. लखनऊ मंडल और बरेली मंडल में वकीलों, किसानों, मजदूरों, पत्रकारों और हाकरों द्वारा किये गए जन-आन्दोलन के चलते प्रशासन के बालों में जूं रेंगी और उन्हें लगभग 9 दिन जेल में रहने के बाद राहत नसीब हुई. मैं जब उनसे मिलने जेल गया था (मैं जेल ही पहली मर्तबा गया था) वहां कैदियों की हालत देख मेरे तो रोये खडे हो गए. अपने भाई को जेल में इस तरह बंद देख मैं खूब रोया. मेरे सबसे छोटे चाचा जो कि पीलीभीत बार एसोशियेशन के अध्यक्ष है अपने सहयोगी वकीलों के साथ उन्हें देखने आये. इस तरह से उन्हें लगभग 9 दिनों के बाद प्रशासन ने जेल से रिहा करने के निर्देश दे दिए. मामला विधान सभा और विधानं परिषद् में भी उठा....
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Sunday, February 7, 2010

भूतों की खबर लीक कर रहा हूँ.......!!!!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
मेरे प्यारे-प्यारे-प्यारे भाईयों और उससे भी प्यारी बहनों तथा माताओं....एवं अन्य तमाम किस्म के लोगों इधर मेरी इस दुनिया में मतलब भूतों की दुनिया में आदमी की इस दुनिया पर बहुत ज्यादा ही विचार विमर्श हो रहा है.....!!विचार-विमर्श इस बात पर,कि आदमी जो सोचता है,वो बोलता क्यूँ नहीं,और जो बोलता है,वो कभी भी करता क्यूँ नहीं...और जो उसे कभी भी करना ही नहीं होता वो आखिर बोलता भी है तो बोलता ही क्यूँ है....??आदमी आखिर है तो है क्या...!!आदमी को इस धरती में आपस में मिलकर रहने के ढंग क्यूँ नहीं आते,और कहने को तो बड़ा ही बुद्धिमान-विद्वान और ना जाने क्या-क्या बनता है....मगर दरअसल वो तो किसी एक साथ तक रहने के काबिल नहीं....और दुनिया-भर के मिलन की बातें करता रहता है....एक तक के साथ भी उसके झगड़ने की कोई सीमा नहीं है...तिस पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें....बाप रे-बाप आदमी है कि क्या है.....??
धरती पर जीने का मतलब आखिर क्या हो सकता है....सुन्दर ढंग से जीने का अर्थ तो प्रेम से ही जीना होता होगा.....है ना....!!मेरे ख्याल से इत्ती सी बात इक इत्ते से छोटे-से बच्चे को भी पता होगी....लेकिन तमाम तरह के अनाप-शनाप ज्ञान को अपने भीतर समेत लेने के बावजूद आदमी की दुनिया में आखिर सही अर्थ में प्रेम क्यूँ नहीं मौजूद है....उसकी दुनिया प्रेम की भूखी क्यूँ है....और उस भूख के बावजूद भी उसकी दुनिया ऐसी मारकाट क्यूँ है....धरती पर ऐसा क्या नहीं है....जो आदमी की भूख और प्यास नहीं मिटा सकता....मगर इस शारीरिक भूख और प्यास से परे भी कुछ ऐसी भूख और प्यास है जो उसे अपने-आप से ना मिलकर किसी और से प्राप्त होती है.... और उसे पूरा करने के लिए यह सारी मारकाट....धोखाधड़ी....बेईमानी....फरेब....और ना जाने क्या-क्या कुछ रचा जाता है.....!!
प्राकृतिक रूप से घटने वाली भूख-प्यास का तो सही इंतजाम भी हो.....मगर इस अहंकार की भूख और प्यास का क्या किया जाए जिसके लिए आदमी इतने-इतने-इतने यत्न करता है....कि उसकी सारी उर्जा इसी सब में नष्ट होती जाती है....यहाँ तक कि यह उर्जा खोकर आदमी यह समझने लायक भी नहीं रहता....कि उसके द्वारा इतना छल-फरेब किये जाने के वास्तविक परिणाम आखिर क्या हुए....तुरत-फुरत तो खैर उसके मन-मुताबिक परिणाम सामने अवश्य दिखाई पड़ रहे हैं....मगर क्या ये परिणाम आदमियत की सेहत के लिए वाकई बेहतर हैं....??
जाति-धरम-रंग-नस्ल-वर्ग और ना जाने किन-किन खांचों में बंटी हुई इस दुनिया में आने वाली नस्ल के लिए कौन से सन्देश छिपे हुए हैं.....हर-इक सेकण्ड पर कहे जा रहे हमारे-झूठ-पर-झूठ....छल-प्रपंच और ना जाने किन-किन बातों से हमारे बच्चे कौन-कौन-सा सन्देश पा रहें हैं.....और जब हम खुद किसी दुसरे के साथ जिस तरह के रंग बदल-बदल कर पेश रहे हैं......तो हमारे बच्चे आगे आने वाली दुनिया में और कौन-कौन से नए रंग बदलेंगे.....??......एक दुसरे से आगे बढ़ने के लिए एक दुसरे को बड़े सपाट ढंग से गिराते चलते हैं...उससे हमारे नए होनहार क्या सीख रहे हैं.....और जब कि आदमी ही उन्हें आदमियत के संस्कार नहीं दे पा रहा है....तो वह क्यूँकर यह अपेक्षा अपने बच्चों से रख पायेगा कि ये बच्चे एक होनहार दुनिया रच भी पायेंगे.....!!
इस विमर्श के बाद भूतों में एकबारगी तो यह राय कायम हुई....कि धरती के सारे आदमियों को क्यूँ ना मार ही डाला जाए....इससे क्या होगा कि सिर्फ आदमी की जात ही लुप्त होगी.....बाकी के सारे प्राणी तो नष्ट होने से बच पायेंगे.....मगर कुछ बुजुर्ग भूतों के बीच-बचाव से यह राय रद्द कर दी गयी.....कि यह काम भूतों का नहीं यह कार्य तो दुनिया के रचयिता है.....जब उसे खुद यह लगने लगेगा कि आदमी के कारण उसकी यह सुन्दर सी सृष्टि नष्ट होने को आई है.....तो वह खुद आदमी को...................!!
करोड़ों भूतों की आम राय कुछेक बुजुर्ग भूतों के कहने पर रद्द कर दी गयी है.....यह खबर मैं राजीव थेपडा नाम का यह भूत जान-बूझ करलीक कर रहा हूँ.....शायद इस बात में आदमी की जात के लिए कुछ पोजेटिव सन्देश छूपे हुए हों.....क्या आदमी यह आवाज़ सुन भी रहा है....क्या आदमी के लिए किसी भी बात के लिए कोई सबक भी है.....क्या आदमी सचमुच एक समझदार जीव है.....क्या सचमुच वह कुछ सीखता भी है......????