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Sunday, February 13, 2011

एक बात कहूँ मैं तुमसे......??
अभी-अभी लाए हो ना तुम पूरे सौ रुपये की किताबें...
और कल ही डांट दिया था मुझे पच्चीस रुपयों की टॉफियों के लिए....
जो बच्चों के लिए लायी थी मैं,और तुमने कहा कि देखकर खर्च किया करो !!
मन मसोस कर रह गयी थी मैं,मगर कुछ कह ना पायी,क्योंकि 
कमाकर लाने वाले तो तुम हो,कैसे कमाया जाता है,यह हम क्या जाने 
अक्सर यह जताते हो हमपर तुम,और हम सचमुच शर्मिन्दा हो जाते हैं उस वक्त 
कमाकर लाना सचमुच आसान तो नहीं है बहुत,मगर बार-बार यह जतलाना तुम्हारा
हमें बहुत-बहुत-बहुत पीड़ित कर डालता है,यह शायद तुम कभी नहीं जान पाते....
क्योंकि उस वक्त हमारे तकरीबन भयभीत मुख तुम्हें ताकत प्रदान करते हैं....
और तब तुम और-और-और हावी हो जाते हो हमपर.....तुम ऊँचे...हम बौने....!!
लेकिन एक बात कहूँ मैं तुमसे...यदि तुम सचमुच तहे-दिल से सुन सको...??
अक्सर घर खर्च मांगती हुईं हम स्त्रियाँ अपने पतियों से "घूरी"जाती हैं....
या लगभग लताड़ ही जाती जब अपने बच्चों या सास-ससुर के सन्मुख....
तब ऐसा लगता है कि यह पैसा हम घर खर्च के लिए नहीं बल्कि....
अपनी ऐश-मौज-मस्ती वगैरह के लिए ले रही होंओं....
और मज़ा तो यह कि हम इसका हिसाब बताने लगें तो कहोगे 
कि तुमसे हिसाब भला कौन मांग रहा है...कि नौटंकी कर रही हो....
और हिसाब ना देन...तो ताने मिलते हैं...कि कोई हिसाब ही नहीं है हमारा....!!
हमारी इन तकलीफों को कभी किसी के द्वारा समझा ही नहीं गया है...
मगर हम किस तरह की कुंठा में जी रही हैं,यह बता भी नहीं सकती पति से...
यह व्यवस्था तो हम सबने मिलकर ही बनायी है ना...
कि हम घर में काम करें और तुम सब कमाकर लाओ....!!
तुम घर चलाने का इंतजाम करो और हम घर चलायें....!!
फिर दिक्कत किस बात की है...क्यूँ भड़कते तो तुम बात-बात पर...
और ख़ास कर खर्च की बात पर....
तुमसे पैसे लेकर क्या हम किसी बैंक के लॉकर में रख डालती हैं,अपने निजी खाते में...
या कि तुम्हारे या अपने बच्चों का कोई इंतजाम करती हैं....!!
सच तो यह है कि अपने बच्चो और तुम्हारी खुशियों के सिवा 
हमें कुछ ख्याल तक भी नहीं आता...और तुम्हारे मर्मान्तक प्रश्न...
हमें कहीं बहुत-बहुत-बहुत भीतर तक घायल कर देते हैं अक्सर....!!
काश तुम्हें कभी कोई यह बता सके कि हम भी तुम्हारी तरह ही एक (जीवित)जीव हैं 
और तुमसे एक ऐसा अपनापन चाहिए होता हैं हमें....
कि हम तुममें छिपकर कोई सपना बुन सकें....
और यदि कोई बात बुरी लगे तो तुमसे लिपटकर जार-जार रो सकें...
काश तुम कभी किसी तरह से यह जान सको कि.....
तुम पति के बजाय एक दोस्त बन सको हमारे....
तो हमारी गलतियां हमारे लिए कभी पहाड़ ना बन सकें....
और हम जी सकें एक-दूसरे के भीतर रमकर....
और बच्चों को दिखा सकें प्रेम के तरह-तरह के रूप 
हम सब बन सकें हम सबके बीच आश्चर्य का प्रतिरूप...!!  


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                                                    हालात बद से बदतर क्यूं होते चले जाते हैं ??
                                         (क्योंकि..........इक ब्राहमण ने कहा है......कि ये खेल अच्छा है.....!!)
                        कभी-कभी जब मै भारत की विभिन्न समस्याओं पर विचार करते हुए इसके कारणों पर जाता हूं,तो अक्सर उनको खत्म करने के लिए जो फ़ैसले मेरे जेहन में आते हैं,भारत के तकरीबन सारे नौकरीपेशा सरकारी कर्मचारियों के हितों के खिलाफ़ जाते हैं और तब मैं सोचता हूं कि शायद इस देश की अधिसंख्य समस्याओं को कभी नहीं मिटाया जा सकेगा,क्योंकि इसे मिटाने के रास्ते में आढे आने वाले होंगे खुद स्वार्थी भारतीयों के व्यापक हित, या कहूं कि स्वार्थ,तो यह ज्यादा समीचीन होगा !यह मैं क्यूं कह रहा हूं इसे आप जरा समझिये !!
               दोस्तों दुनिया भर में हम प्रत्येक उत्पाद को उसकी क्वालिटी के आधार पर तौलते हैं,प्रत्येक वह वस्तु,जो हमारे विचार के निम्नतम मानकों या फिर किसी भी तरह के संगठन या सरकारी मानक पर सही उतरती है,सिर्फ़ उसे ही हम अपनाना जारी रखे रहते हैं,उससे कम वाली वस्तु को तत्काल खारिज़ कर देते हैं,यह अलिखित व्यवस्था शायद हमारे समाज के रूप में संगठित होने के समय से चली आ रही है और इसीलिए तमाम क्वालिटी वाले उत्पाद कुछ ही समय में बाज़ार पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेते हैं और उन्हें बनाने वाली कंपनियां एक ब्राण्ड नाम बन जाती हैं और अपने उस ब्राण्ड को यथाशक्ति कायम रखने का यत्न करती हैं तथा उन वस्तुओं को उपयोग में लाने वाला प्रत्येक उपभोक्ता भी अपने मन में एक तरह की राहत महसूस करता है,इसी प्रकार समाज के अन्य स्थानों पर भी यह लिखित और अलिखित व्यवस्था कायम दिखाई देती है जैसे स्कूल-कोलेज और अन्य तमाम संस्थानों में बच्चों-युवाओं और कर्मचारियों का मामला है,जहां बच्चों-युवाओं और कर्मचारियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर नंबर,ग्रेड या वेतन आदि दिए जाते हैं,यानि कि जो बेहतर है,उसे बढिया और जो खराब है उसे उसे खराब ही कहा जाता है,यहां तक कि जो जितना बढिया या खराब है,उस आधार पर भी यही बात होती है,इस प्रकार यह ग्रेडिंग-मार्क और वेतन तरह-तरह का भी हो सकता है,होता है !

              लेकिन दोस्तों भारत के मामले में और खासकर कि सरकारी क्षेत्र में यही मामला एकदम से उलट जाता है,तमाम नैतिक और आदर्शवादी चिंतन "झाडने" वाले और निजी क्षेत्र के लोगों को तरह-तरह के पाठ पढाने वाले यही सरकारी लोग अपने काम के मामले में अपनी सारी बौद्धिकता मानो एकदम से खो ही देते हैं,यहां तक कि अपना काम भी नहीं करते,यहां तक कि अपना ही काम करने के लिए सरकार से लिए जा रहे वेतन के बावजूद अपने सम्मूख खडे हुए अपने ही समाज के प्रत्येक व्यक्ति से "अनुदान"(घूस,रिश्वत,कमीशन या जो भी कहिए) लेते हैं !और उसके बाद भी ये उस काम कराने वाले को दौडाते हैं !महंगाई और अन्य मुद्दों पर बात-बात पर आंदोलन करने वाले ये लोग अपने ही काम से विमूख और किसी की जान ले लेने की हद तक लापरवाह होते हैं,शर्म जिनको रत्ती भर भी छू नहीं गयी होती है !
              और इसका परिणाम क्या है ? इसका परिणाम यह है दोस्तों कि बिना काम के या कि राई बराबर काम के और वो भी उस काम को करने के एवज में लिए जाने वाले "अनुदान" के कारण ये लोग आर्थिक रूप से अत्यंत सुदढ होते चले जाते है,इनके घर में तमाम तरह के साधन मौजूद हो जाते हैं,जो दरअसल उस किसी ईमानदार कर्मचारी की खिल्ली उडाते हुए प्रतीत होते हैं,जिन बेचारों ने रोजी-रोटी के जुगाड से ज्यादा कभी कुछ सोचा ही नहीं होता, ! इन ईमानदार लोगों को कभी इन स्थितियों पर क्षोभ होता है,कभी क्रोध आता है तो कभी अपने-आप पर शर्म आती है,क्योंकि उनके बच्चे वो सब नहीं हासिल कर रहे होते जो भ्रष्ट लोगों के बच्चे कर रहे होते हैं,उनकी बीवीयां वो मस्ती नहीं कर रही होती जो उन भ्रष्ट लोगों की पत्नियां करती होती हैं !!.....अगर यह सब भी छिपे-छिपाए हुए हो तो शायद ईमानदार लोग अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीते रहें मगर होता यह है कि तमाम भ्रष्ट लोग तमाम ईमानदार लोगों का मज़ाक बनाया करते हैं,यहां तक कि ईमानदार लोग अपनी ईमानदारी पर गर्वित होना त्याग कर शर्मिंदा होने लगते हैं !!
             दोस्तों,यही वो स्थिति है जो किसी भी जगह को बदहाल बनाने लगती है,कोढ बन कर सारे शरीर को गलाने लगती है,घुन बनकर सारे चरित्र को खाने लगती है,क्योंकि अपनी सारी विवेकशीलता के बावजूद भी इंसान एक ऐसा जीव है,जो ज्यादातर दूसरों की देखा-देखी करता है....और इस प्रकार सारे समाज का आचरण बदलने लगता है और एक समय समुचे समाज का चरित्र ही बदल जाता है....क्योंकि खुशहाल तो दोस्तों हर कोई ही होना चाहता है,मैं भी...आप भी और इसी तरह सब ही.....!!और इस खुशहाली का हर रास्ता वाया "धन-सम्पत्ति" होकर ही जाता है और इस धन-सम्पत्ति का शार्ट-कट बेईमानी-धूर्तता-भ्रष्टाचार-अनैतिकता ही है,भले उससे कितनी ही अराजकता क्यों ना फैल जाती होओ.....और समाज एक बदबूदार गंदे "स्लम"
में तब्दील क्यूं ना हो जाता होओ !!
            ऐसे में ओ दोस्तों !आप सब ऐसा विचार कर भी कैसे सकते हो कि भारत कभी सुधर भी सकता है,जब आप लकडी से दीमक निकालने के बजाय उसे अपने प्रत्येक क्षण पोषित करते जाते हो,आपका हर कदम उन दीमकों को अपार भोजन प्रदान करता है,क्योंकि ये लोग अब ढेर-ढेर-ढेर सारे हैं,इतने कि एक समुचा "वोट-बैंक"...और आप इनकी अनदेखी कर अपने पेट (सीट!!) लात नहीं मार सकते....ऐसे ही लोगों को आप बचाते हो,ऐसे ही लोगों को आप प्रोन्नत करते हो...ऐसे ही लोगों को आप कर्मठ,ईमानदार और देश के जान देकर भी काम करने वाले देवता-समान लोगों के बराबर वेतन देते हो...और ऐसे ही लोग,जो अपने लिए जाने वेतन के बावजूद अपने सम्मूख उपस्थित "उपभोक्ता" को चूस कर अपना खून बढाता है...को अपने साथ रखकर "श्रेष्ठ-बेहतर और बेहतरतम" लोगों का मान-मर्दन करते हो...तब आप देश की सम्स्याओं का अन्त होने का सपना?? कैसे देख सकते हो...??
            दोस्तों,अगर वक्त रहते इस दोषपूर्ण प्रणाली में बदलाव नहीं किया गया तो इस देश के शिक्षक बच्चों को बे-ईमान और करप्ट ही बनाते रहेंगे...बिजली वाले,पानी वाले,सडक वाले,उर्जा वाले,वन वाले,विग्यान वाले,ग्रामीण-विभाग वाले,लोक-कल्याण वाले,सेल्स-टैक्स वाले,इनकम-टैक्स वाले,कामनवेल्थ वाले,नगर-निगम-पालिका वाले,पुलिस वाले,ट्रैफ़िक वाले,ये विभाग वाले,वो विभाग वाले,सब विभाग वाले....सब के सब हम भारतीयों द्वारा दिए गये विभिन्न तरह के टैक्सों से हर साल लाखों-लाख करोड (जी हां,हर महकमे में होने वाले भ्रष्टाचार का निम्नतम अनुमान भी लाखों करोड की राशि पर जाकर ठहरता है और इसी के लिए तो यह मारामारी है भाईयों...!!)खा-खाकर ऐश-मौज भी करते रहेंगे...डकारते भी रहेंगे....स्विस-बैंकों में अपना धन भी रखते रहेंगे...जो आज दो लाख करोड रुपये है....कर चार....परसों पांच लाख करोड रुपये भी हो जाएगा...तो आपके बाप के बाप के बाप का बाप भी क्या कर लेगा.....??है क्या दस का दम किसी भारतीय में.....??है क्या कोई सच्चा भारतीय....??
            दोस्तों !! चिल्लाते ही रह जाएंगे हम मरे हुओं से भी बदतर लोग.....और बेच कर खा जाएंगे भारत को भारत के ही तमाम "हरामी" (प्लीज़ यही कहने दीजिये मुझे !!) लोग....और स्वर्ग??(नरक नहीं क्या??) जाकर हम चिल्लायेंगे.....ईंडिया शाईनिंग....ईंडिया शाईनिंग.....इक ब्राहम्ण ने कहा है......कि ये खेल अच्छा है.....!!!!

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Friday, January 28, 2011


ख्वाजा मेरे ख्वाजा ....दिल में समां जा ......श्याम की राधा....अली का दुलारा...ख्वाजा मेरे ख्वाजा !!.....एक धुन सी हर वक्त दिल में मचलती रहती है...हर किसी के प्रति प्यार में पगा ये दिल किसी-न-किसी को अपने पास ही नफरत के शोलों से भड़कता देखकर दिन-रात परेशान होता रहता है!! सबको इस जीवन में इंसानों के बीच ही रहना है,और वो भी अपने आस-पड़ोस के लोगों के बीच ही......मगर सबके-सब एक अनदेखे-अनजाने खुदा... भगवान...गाड...आदि के पीछे ऐसे बावले....उतावले हुए रहते हैं कि मारकाट तक पर उतारूं हैं.....!!मन्दिर- मस्जिद-गिरिजा से इस नामालूम से ईश्वर को बाहर लाकर अपने बीच के रिश्तों में खड़ा कर दिया है इसे ....!! हम सब एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे के भरोसे के लिए,एक-दूसरे के प्यार के लिए जीते हैं ....!दूसरे के लिए जीना ही प्यार है...और दूसरे के लिए मर-मिटना ही उस प्यार की पराकाष्ठा !! मगर खुदा या भगवान के लिए मरना और मारना उस प्यार और इंसान की ही नहीं बल्कि खुदा या भगवान् की भी तौहीन है ...शायद ये मारने वाले नहीं जानते...मगर चंद हत्यारों के कुकर्मों के कारण आपसी विश्वास की चूले हिलने लगी हैं और उसका दुष्परिणाम आगे क्या होने को है ....क्या ये खुदा अथवा भगवान् या गोड के बन्दे कभी समझ भी पायेंगे ?? ईश्वर का सही स्थान देवालयों या फ़िर अपने ख़ुद के ही दिल में होता है....सबसे उचित स्थान तो निस्संदेह हमारा दिल ही है ...जहाँ जरा सी गर्दन झुकाई और यार की सूरत देख ली !!.... मगर दिल की और रुख ना करने वाले आदमी को चैन ही नहीं है ...सब गोया इसी बात के लिए बेचैन हैं कि जिसे वो पूजते हैं सिर्फ़-व्-सिर्फ़ वाही श्रेष्ठ है और बाकी के सब-के-सब भी उसे ही पूजें !!यही उस पागलपन की इन्तेहाँ है ,जो हमें बावलों की तरह लडाती रहती है.......!!!! और तो और जिस बुद्धिजीवी वर्ग से इसका समाधान पाने की आशा की जाती है वो ख़ुद भी इस पागलपन का अगुआ बन बैठता है !!....ब्लॉग वगैरह से लेखक लोग आपसी अनबन के कारण निकाले जा रहे हैं ...कोई एक दूसरे को समझने-समझाने के प्रयास नहीं करता !!बस यही कि हमें नहीं फुर्सत तुम्हें समझने की..चलो भागो यहाँ से ....पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते हैं हमें समझाने !! ... यह प्रचलन ,यानि कि दूसरे को समझने कि कोई चेष्टा नहीं करना या दूसरे को अपने सामने बिल्कुल ही तुच्छ समझना हर किस्म के वर्ग में है ............यह सब हम सबमें दूरी बढ़ा रहा है.....यह सब हमें समाधान तो क्या,और भी गहरी समस्या की और ले जा रहा है .....मगर शायद हम ये तो समझते ही नहीं या फ़िर अपने अंहकार की वजह से समझना ही हैं चाहते !!...........मगर हम कहाँ जा रहे हैं ...हमारा भविष्य क्या है...यह कोई भी विवेकवान व्यक्ति बिना सोचे ही बता देगा !!.............अगर हम सचमुच ही अपने-आप को सभ्य और विवेकशील मानते है तो अभी-की-अभी इस पर निर्णय लेना होगा....तथा हर समुदाय के व्यक्ति को अपने उग्रपंथियों को काबू में करना होगा तथा कट्टरपंथियों पर भी लगाम कसनी ही होगी.....वरना ये लोग हमें जहाँ ले जायेंगे ,उसकी तस्वीर की कल्पना भी भयावह है !!...........अब सिर्फ़-व्-सिर्फ़ आदमी ही बनकर रहा जा सकता है इससे कमतर की जो बात सोचतें हैं वे दुनिया को सिर्फ़ पीछे ही ले जा सकते है मगर दुनिया पीछे जाने के लिए बनी ही नहीं है ....वह तो या तो आगे ही जायेगी ..या फ़िर ऐसे लोगों की वजह से मिट जायेगी !!!

Monday, January 24, 2011


                   कोटि-कोटि नमन तुझे है......





हे स्वर साधक......सूर सम्राट.......सरस्वती भक्त
तुझे विश्व की विनम्र श्रद्धांजलि.........................
तुझे शत-शत नमन करते हैं हम......................
तुझे ह्रदय में बिठा-रखेंगे हम...........................

Saturday, January 22, 2011



क्या याद है तुम्हें,जब हम मिले थे कभी पहली-पहली बार...
कहाँ याद होगा भला तुम्हें,तुम्हें भला इतनी फुर्सत ही कहाँ...
मैं बताती हूँ तुम्हें,तुम अवाक रह गए मुझे देखकर...
और आँखों-ही-आँखों में मेरी प्रशंसा की थी,और मैं खुश हो गयी
मैं खुश हो गयी थी इस बात पर कि,कोई इस तरह भी देखा करता है 
तुम्हें लगा मैं यही चाहती हूँ...तुम भी खुश हो गए....
अपने पहले ही देखने में दिल दे चुके थे मुझे तुम...
मगर मैंने तुम्हें तौलने में कुछ वक्त लगाया....
क्यूंकि लड़कियां अक्सर इस तरह दिल नहीं दिया करती...
और फिर कुछ मुलाकातों में ही यह तय हो गया कि तुम मेरे हो 
उन दिनों तुम मेरी हर बात का कितना ख्याल रखते थे...
हर छोटी-छोटी बात पर बिछ-बिछ जाया करते थे,सर नवा कर 
और मुझे लगता कि मुझे समझने वाला इक सच्चा हमदर्द मिल गया 
मेरे अकेलेपन को बांटने वाला एक सही इंसां मिल गया है....
और मैं भी मर मिटी थी तुमपर,तुमसे भी ज्यादा...
तुम सोचते थे मैं यही चाहती हूँ...बस यही चाहती हूँ...खुश रहना 
इसी आधे सच से गुजर रहा था हमारा प्यार...इकरंग हमारा संसार...
और तब हमने शादी कर ली अपने घर वालों के विरोध के भी बाद 
और बना बैठे हम अपने सपनों का नया इक संसार 
जहां हमारे बीच प्यार था,मनुहार था,चुहल थी,तकरार थी....
और भी बहुत कुछ था,जिसमें साथ-साथ बिताते थे हम कितना ही वक्त 
बाँटते थे अपने सारे मुद्दे...गम...बातें...चुटकुले और हंसी....
तुम्हें लगा मैं यही चाहती हूँ...तुम इतने में खुश रहते थे....
बेशक मैं भी खुश थी तुम्हारी ही तरह....क्यूंकि तुम मुझमें खुश थे
और यह सिलसिला कुछ दिन तक चला...
उन दिनों मैं बहुत मादक-कमनीय और अद्भुत आकर्षक थी तुम्हारी नज़र में 
और मेरी नज़र में दुनिया के सबसे समझदार और प्यार करने वाले पति...
एक-एक कर फिर हमारे दो-दो बच्चे हो गए....और मैं ढीली-ढाली तुम्हारी नज़र में 
मेरी कमनीय देह दो बच्चों को जन्म देकर वैसी नहीं रह पायी थी...
जैसा कि देखने की आदत पड़ी हुई थी तुम्हें बिलकुल टाईट या कसी हुई
मेरे स्तन लटक गए थे और योनि भी शायद कुछ ढीली...
तुम्हारी नज़र अब नयी बालाओं पर जा टिकती थी....
और मैं ताकती थी तुम्हें टुकुर-टुकुर,तुम्हारी भूख का आभास करती...
हालांकि बच्चों को प्यार तुम खूब करते थे और कर्तव्य सारे पूरे 
हंसती-खेलती गुजर रही थी इसी तरह गृहस्थी हमारी 
तुम अब भी कोशिश करते थे मुझे सदा खुश रखने की और...
सब कुछ पूरा किया करते थे अपनी पूरी तल्लीनता के साथ...
तुम्हें लगा मैं यही चाहती हूँ...और मैं भी खुश रहती थी तुम्हारे संग..
तुम्हारी अर्द्धांगिनी बन सदा पूर्ण परिवार का वायदा निभाती हुई....

कुछ लड़कियां भी दोस्त थी तुम्हारी,जो बेहिचक घर आती थीं...
मुझे कभी कोई शक नहीं हुआ,कि तुम वैसे नहीं हो,औरों की तरह...
मगर एक दिन जो मेरे बचपन का दोस्त आया था मुझसे मिलने हमारे घर
मैंने ताड़ लिया था तुम्हारी आँखों में कोई शक....तुम्हारा कोई डर...
और फिर उसके बाद मैनें कभी अपने पुरुष मित्र को नहीं आने दिया अपने घर 
हम हमेशा साथ चलते रहे....बच्चे हमारे बड़े होते रहे...हम सब खुश-खुश ही रहे 
तुम्हें लगा मैं यही चाहती हूँ...मैं इसी तरह जी रही थी तुम्हारे आसपास 
तुम्हारे शौक मेरे सर माथे पर...और मेरी हॉबी हमारी गृहस्थी में बाधक 
मैं भी कुछ रचना चाहती,मैं भी कुछ गढ़ना चाहती थी...और 
सोचती रहती थी सारा-सारा दिन जाने तो क्या-क्या...
मगर समझ ही नहीं आता था इस तरह बंधे-बंधे करूँ मैं आखिर क्या...
पढना-लिखना-गाना-नाचना और पेंटिंग हो गए सब हवा...
बच्चे और तुम जब घर आ जाते थे तो मैं खुश ही रहती थी सदा...
तुम्हें लगा मैं यही चाहती हूँ...तुम्हारी चाहना पूरी करते हुए मेरे 
तुमने बाहर जो भी चाहा...वो लगभग हासिल ही किया..
मैं भीतर हमारा(या सिर्फ तुम्हारा)घर संभालती रही...
और मैंने जो भी सपना देखा....मन मसोस कर रह गयी...
कई बार सोचा था कि तुमको कुछ दिल की बात कहूँ...मगर 
कुछ तुम्हारी व्यस्तताओं के,कुछ किसी भय के कारण कहने से रह गयी 
और इसी तरह मेरी सारी आकांक्षाएं एक-एक करके ढह गयी...
जो सोचा,वो कभी कह ना सकी-लिख ना सकी-रच ना सकी 
बंदिशों में गृहस्थी को संवारती हुई परिवार का घर चलाती रही 
हर चीज़ में मर्ज़ी तुम्हारी होती...यहाँ तक कि रसोई भी तुम्हारी मर्ज़ी की 
और तुम थोडा छुट दे देते तो पूरी होती बच्चों की मर्ज़ी...
मैंने कभी नहीं जाना सच कि आखिर मेरी मर्ज़ी है क्या...
और कभी मर्ज़ी ने खोले पंख तो भयभीत होकर सिमट गयी मैं खुद 
गृहस्थी को कभी आंच ना आये मेरे कारण,मैंने मर्ज़ी समेट ली 
सबकी मर्ज़ी को जीते हुए अपने बच्चों की शादी भी कर दी 
अब भी थोड़ी तुम्हारी मर्ज़ी चलती है,फिर बच्चों की,फिर बच्चे के बच्चों की 
सबकी इच्छाओं में मैं सदा से अपना जीवन बून रहीं हूँ 
सबकी सब तरह की हवस को पूरा करते मैं खुद में खुद को ढूंढ रही हूँ
सबको लगता है,मैं यही चाहती हूँ...मैं नारी हूँ....पुरुष की एक सहगामिनी....और 
मैं समझ नहीं पा रही अब किसी के सम्पूर्ण साथ होकर भी अपनी सम्पूर्णता का अर्थ....!!!   

Wednesday, January 19, 2011

ऐ...तू, तू है....कोई चीज़ नहीं है.....!!
तेरे भीतर भी कोई आवाज़ है....
तेरे अन्दर भी कोई साज है....
तू सभी चीज़ों का आगाज है....
तू, तू है....कोई और नहीं....एक जीवंत राज है   
तू, तू है....कोई चीज़ नहीं है....
ऐ...तू कभी तेरे को पहचान ना कभी....
कि तेरे भीतर भी कोई आदमी आग है....
बस....पता नहीं क्यों इसपर....
जन्मों-जन्मों से बिछी हुई राख है...
ऐ पागल...तू,तू है....तेरे भीतर भी कोई है..
कोई व्यक्तित्व...कोई निजता....कोई आत्मा....
तू नहीं है किसी के विलास का एक साधन मात्र 
मगर,अगर तू ऐसी ही रही...तो समझ ले कि 
ऐसा ही रहेगा यह आदम भी जैसे-का-तैसा 
एक अनंत यौनिकता...एक बर्बर भूख...
अगर तू इसकी मान ले तो बहुत अच्छा....

अगर नहीं तो ताकत के सहारे आक्रमण कर देगा 
और कहेगा कि नहीं हो सकता आज के युग में ऐसा...
नहीं यह सिर्फ एक तरफ़ा सोच नहीं है मेरी....
अपने चारों तरफ देख रहा हूँ यही एक भूख....
अनंत काल से अनन्त रूप से भूखी भूख....
मगर ऐ पागल....तेरा काम सिर्फ यही तो नहीं है ना...?
किसी के साथ कुछ रात गुजार देना....
किसी के देखने के लिए अपनी मांसलता संवार लेना...
क्या महज एक जिस्म है तू....?
जैसा कि तूने बना दिया है खुद को....!!
अगर ऐसा कुछ ही खुद को मानती है तू....
तब तो मुझे तुझसे कुछ नहीं कहना....मगर,
अगर सच में तू एक निजता है...एक व्यक्तित्व..एक आत्मा..
तो इसे पहचान ना री पगली....
निरी पशु बन कर क्या जीए जा रही है तू....
थोड़े से क्षेत्रों में कुछेक नौकरियां करके भी....

तू बनाए तो हुए है खुद को विलास का एक हूनर....
कहीं मजबूरी....तो कहीं खुद आगे बढकर....!!
जिन्दगी क्या है....कभी सोचा भी है तूने....?
तो भला क्या सिखा सकती है तू अपने बच्चों को...!!
और जिन बच्चों ने तुझसे कुछ नहीं जाना....
क्योंकि तूने खुद ने ही नहीं जाना....
तो कैसा बनाएंगे....जिन्दगी को वे....

और कैसी बनेगी बिना जाने हुए बच्चों से यह धरती....
(जैसी कि बनती जा रही है,कैरियर के लिए लड़ते 
और हवस को पूरा करने में खुद को झोंकते ये युवा...)
अरी ओ पगली....तू तो है जन्म देने वाली....
किसी को जन्म देने से पहले......
कम-से-कम अब तो खुद को पहचान....
ज़रा यह तो सोच कि कितनी विराट है तू....!!
तेरे भीतर पलता है एक अनंत व्याकुल जीवन....
इस जीवन की व्याकुलता को सही दिशा में साध....
तू है इस धरती पर एक गहन-गह्वर योगिनी....

तू मत बन पगली महज एक बावली भोगिनी....
कि तू....सच में तू है अगर....
तो आ....अपनी प्यास को पहचान....
अपने-आप से कोई नयी बात कर.....
अपने बच्चों को कोई नयी प्यास दे....
अपनी तलाश कर....अपना गुमां पहचान
देख ना री....यह धरती कुम्भलाई जा रही है....
तू अनन्त की इस भीड़ में मत खो जा री....
तेरे आने वाले बच्चे तुझसे बड़ी आस में है...


यह धरती एक नयी नस्ल की तलाश में है....!!
अब इस भीड़ में तू अपने लिए एक अनंत वीराना बून....
फिर देख दुनिया तेरे भीतर यूँ सिमट जाएगी....
जैसे कि इक भक्त में.....समा जाता है....परमात्मा....!! 

Saturday, January 15, 2011


ए बन्दर…
बोलो सरकार…
सबसे बडे चोर को कहते हैं क्या…
महाचोर सरकार…!
और चोरों के प्रमुख को…?
चोरों का सरदार…!
अगर तू कोई चीज़ चुरा लाये
तो दुनिया चोर तुझे कहेगी या मुझे…
हमदोनों को सरकार…!

लेकिन चोरी तो तूने ना की होगी बे…
लेकिन मेरे सरदार तो आप ही हो ना सरकार…!
ये नियम तो सभी जगह चलता होगा ना बन्दर…
हां हुजूर और जो इसे नहीं मानते हैं…
वो सारे चले जाते है अन्दर…!
अरे वाह,तू तो हो गया है बडा ज्ञानी बे…
सब आपकी संगत का असर है सरकार…!
तो क्या संगत का इतना ज्यादा असर हो जाता है…?
हां हुजूर,एक सडी हुई चीज़ से सब कुछ सड जाता है…!
ये बात तो आदमियों में लागू होती होगी ना बे…?
आदमी पर सबसे ज्यादा असर होता है इन सबका सरकार…!
मतलब किसी के किसी भी सामुहिक कार्य की जवाबदेही…
सिर्फ़ व सिर्फ़ उसके मुखिया की होती है सरकार…!!
मगर आदमी ये बात क्यों नहीं समझता बे बन्दर…?
सरकार,आदमी असल में सबसे बडा है लम्पट…
आदमी है सबसे बडा बेइमान और मक्कार…सरकार…!
और सब तरह के भ्रष्ट लोगों का मुखिया भी…
उसपर अंगुली उठाने पर कहता है खबरदार…!!
तो हुजूर…मेहरबान…कद्रदान…पहलवान…मेहमान…भाई-जान 
ऐसा है हमारा यह बन्दर…
जो कभी-कभी घुस जाता मेरे भी अन्दर....!!
मगर हां हुजूर,जाते-जाते एक बात अवश्य सुनते जाईए…
यह बन्दर…हम सबके है अन्दर…
जो बुराईयों को पहचानता है,सच्चाई को जानता है…!
मगर ना जाने क्यों इन सबसे वो आंखे मूंदे रहता है…!
अपनी आत्मा को बाहर फ़ेंककर किस तरह वो रहता है…?
और अपनी पूरी निर्लज्जता के साथ हंसता-खिखियाता हुआ…
कहीं अपने घर का मुखिया…कहीं किसी शहर का मेयर…
कहीं किसी राज्य का मुखिया…कहीं किसी देश का राजा…
इन बन्दर-विहीन लोगों ने देश का बजा दिया है बाजा…!!!!