अगर आप ''फाइट फॉर राईट''पर कुछ लिखना चाहते है तो मेंबर बनने के लिए हमे ईमेल करे- right.for.fight@gmail.com पर! साथ ही साथ ऐसे लेखकों से अनुरोध है की वे इस ब्लॉग की मेम्बरशिप के लिए ईमेल न करे जिनका दिल कमजोर हो!!

Website templates

Wednesday, January 19, 2011

ऐ...तू, तू है....कोई चीज़ नहीं है.....!!
तेरे भीतर भी कोई आवाज़ है....
तेरे अन्दर भी कोई साज है....
तू सभी चीज़ों का आगाज है....
तू, तू है....कोई और नहीं....एक जीवंत राज है   
तू, तू है....कोई चीज़ नहीं है....
ऐ...तू कभी तेरे को पहचान ना कभी....
कि तेरे भीतर भी कोई आदमी आग है....
बस....पता नहीं क्यों इसपर....
जन्मों-जन्मों से बिछी हुई राख है...
ऐ पागल...तू,तू है....तेरे भीतर भी कोई है..
कोई व्यक्तित्व...कोई निजता....कोई आत्मा....
तू नहीं है किसी के विलास का एक साधन मात्र 
मगर,अगर तू ऐसी ही रही...तो समझ ले कि 
ऐसा ही रहेगा यह आदम भी जैसे-का-तैसा 
एक अनंत यौनिकता...एक बर्बर भूख...
अगर तू इसकी मान ले तो बहुत अच्छा....

अगर नहीं तो ताकत के सहारे आक्रमण कर देगा 
और कहेगा कि नहीं हो सकता आज के युग में ऐसा...
नहीं यह सिर्फ एक तरफ़ा सोच नहीं है मेरी....
अपने चारों तरफ देख रहा हूँ यही एक भूख....
अनंत काल से अनन्त रूप से भूखी भूख....
मगर ऐ पागल....तेरा काम सिर्फ यही तो नहीं है ना...?
किसी के साथ कुछ रात गुजार देना....
किसी के देखने के लिए अपनी मांसलता संवार लेना...
क्या महज एक जिस्म है तू....?
जैसा कि तूने बना दिया है खुद को....!!
अगर ऐसा कुछ ही खुद को मानती है तू....
तब तो मुझे तुझसे कुछ नहीं कहना....मगर,
अगर सच में तू एक निजता है...एक व्यक्तित्व..एक आत्मा..
तो इसे पहचान ना री पगली....
निरी पशु बन कर क्या जीए जा रही है तू....
थोड़े से क्षेत्रों में कुछेक नौकरियां करके भी....

तू बनाए तो हुए है खुद को विलास का एक हूनर....
कहीं मजबूरी....तो कहीं खुद आगे बढकर....!!
जिन्दगी क्या है....कभी सोचा भी है तूने....?
तो भला क्या सिखा सकती है तू अपने बच्चों को...!!
और जिन बच्चों ने तुझसे कुछ नहीं जाना....
क्योंकि तूने खुद ने ही नहीं जाना....
तो कैसा बनाएंगे....जिन्दगी को वे....

और कैसी बनेगी बिना जाने हुए बच्चों से यह धरती....
(जैसी कि बनती जा रही है,कैरियर के लिए लड़ते 
और हवस को पूरा करने में खुद को झोंकते ये युवा...)
अरी ओ पगली....तू तो है जन्म देने वाली....
किसी को जन्म देने से पहले......
कम-से-कम अब तो खुद को पहचान....
ज़रा यह तो सोच कि कितनी विराट है तू....!!
तेरे भीतर पलता है एक अनंत व्याकुल जीवन....
इस जीवन की व्याकुलता को सही दिशा में साध....
तू है इस धरती पर एक गहन-गह्वर योगिनी....

तू मत बन पगली महज एक बावली भोगिनी....
कि तू....सच में तू है अगर....
तो आ....अपनी प्यास को पहचान....
अपने-आप से कोई नयी बात कर.....
अपने बच्चों को कोई नयी प्यास दे....
अपनी तलाश कर....अपना गुमां पहचान
देख ना री....यह धरती कुम्भलाई जा रही है....
तू अनन्त की इस भीड़ में मत खो जा री....
तेरे आने वाले बच्चे तुझसे बड़ी आस में है...


यह धरती एक नयी नस्ल की तलाश में है....!!
अब इस भीड़ में तू अपने लिए एक अनंत वीराना बून....
फिर देख दुनिया तेरे भीतर यूँ सिमट जाएगी....
जैसे कि इक भक्त में.....समा जाता है....परमात्मा....!! 

Saturday, January 15, 2011


ए बन्दर…
बोलो सरकार…
सबसे बडे चोर को कहते हैं क्या…
महाचोर सरकार…!
और चोरों के प्रमुख को…?
चोरों का सरदार…!
अगर तू कोई चीज़ चुरा लाये
तो दुनिया चोर तुझे कहेगी या मुझे…
हमदोनों को सरकार…!

लेकिन चोरी तो तूने ना की होगी बे…
लेकिन मेरे सरदार तो आप ही हो ना सरकार…!
ये नियम तो सभी जगह चलता होगा ना बन्दर…
हां हुजूर और जो इसे नहीं मानते हैं…
वो सारे चले जाते है अन्दर…!
अरे वाह,तू तो हो गया है बडा ज्ञानी बे…
सब आपकी संगत का असर है सरकार…!
तो क्या संगत का इतना ज्यादा असर हो जाता है…?
हां हुजूर,एक सडी हुई चीज़ से सब कुछ सड जाता है…!
ये बात तो आदमियों में लागू होती होगी ना बे…?
आदमी पर सबसे ज्यादा असर होता है इन सबका सरकार…!
मतलब किसी के किसी भी सामुहिक कार्य की जवाबदेही…
सिर्फ़ व सिर्फ़ उसके मुखिया की होती है सरकार…!!
मगर आदमी ये बात क्यों नहीं समझता बे बन्दर…?
सरकार,आदमी असल में सबसे बडा है लम्पट…
आदमी है सबसे बडा बेइमान और मक्कार…सरकार…!
और सब तरह के भ्रष्ट लोगों का मुखिया भी…
उसपर अंगुली उठाने पर कहता है खबरदार…!!
तो हुजूर…मेहरबान…कद्रदान…पहलवान…मेहमान…भाई-जान 
ऐसा है हमारा यह बन्दर…
जो कभी-कभी घुस जाता मेरे भी अन्दर....!!
मगर हां हुजूर,जाते-जाते एक बात अवश्य सुनते जाईए…
यह बन्दर…हम सबके है अन्दर…
जो बुराईयों को पहचानता है,सच्चाई को जानता है…!
मगर ना जाने क्यों इन सबसे वो आंखे मूंदे रहता है…!
अपनी आत्मा को बाहर फ़ेंककर किस तरह वो रहता है…?
और अपनी पूरी निर्लज्जता के साथ हंसता-खिखियाता हुआ…
कहीं अपने घर का मुखिया…कहीं किसी शहर का मेयर…
कहीं किसी राज्य का मुखिया…कहीं किसी देश का राजा…
इन बन्दर-विहीन लोगों ने देश का बजा दिया है बाजा…!!!! 

Friday, January 14, 2011

ऐ औरत !!अब तुझे रूपम पाठक ही बनना होगा....!!


ऐ  औरत !!अब तुझे रूपम पाठक ही बनना होगा.....
ऐ औरत !!अब अगर तूझे सचमुच एक औरत ही होना है 
तो अब तू किसी भी व्यभिचारी का साथ मत दे....
जैसा कि तेरी आदत है बरसों से 
घर में या बाहर भी......
कि हर जगह तू सी लेती है अपना मुहं 
घर में किसी अपने को बचाने के लिए.....
और बाहर अपनी अस्मत का खिलवाड़.....
इस सबको झेलने से बेहतर तू समझती है....
सबसे ज्यादा अच्छा अपना मुहं सी लेना....

और तेरे मुहं सी लेने की कीमत क्या है,तू जानती है...??
 तेरी ही कोख से जने हुए ये बच्चे...बूढ़े...और जवान....
सब-के-सब तुझ पर चढ़ बैठना चाहते हैं....
ये उद्दंड तो इतने हो गए हैं तेरी चुप्पी से....
कि इन्हें कुछ नज़र ही नहीं तुझमें,तेरी कोख के सिवा 
......तो अब तू सोच ना....कि तेरे पास अब चारा ही क्या है...
......आ मैं बताता हूँ तुझे....लेकिन मैं क्या बताऊँ 
......अब तो सबको रूपम ने बता ही दिया है.......
.......उठा ले हाथों में कटार....या फिर कुछ और....
.......बेशक ये रास्ता मुश्किल से बहुत है भरा......
.......मगर कुछ ही दिन करना होगा यह तुझे...
.......उसके बाद देख लेना.............
......कि तेरी तरफ उठने वाला हर नापाक कदम 

......तेरा क्रोध भरा चेहरा देखकर....
.......वापस लौट जाएगा....अगले ही दम....!!
......ऐ औरत तू ज़रा सी देर के लिए बना ले....
.....खुद को दुर्गा का कोई भी अवतार.....
.....जो आज बनी है रूपम सी कोई....
......अपने बच्चों को बता अपने रौद्र रूप के मायने 
......और आदमी रुपी जानवर की वीभत्सता का क्रूर सच...
......तेरे भीतर की दुर्गा अगर तुझमें ज़रा सी भी अवतरित हो जाए...
......तो हर वहशी इंसान को अपनी औकात पता चल जाए...!! 

Wednesday, January 5, 2011


मन मचलता है....
मगर कुछ कह नहीं पाता....
पता नहीं किस दिशा से 
इसे कोई अज्ञात बुलाता....
कौन कानों में कुछ सुरसुरा देता है...
कौन देह को छुईमुई बना देता....
कौन आँखों को रौशन-सा 
करके भी इक धुंध भर देता है 
कौन ह्रदय को महका जाता....
मन मचलता है....
मगर कुछ कह नहीं पाता 
कहाँ से आ जाते हैं  
आँखों में अनंत सपने.....  
कौन कल्पनाओं को बना कर  
मुझमें उड़ेल देता....
कौन नस-नस में जीने की 
ताकत भर देता है....
और भरी उदासी में यकायक 
उमंग को पग देता है.....
ये कौन है जो होकर नहीं है और 
नहीं होकर होने की तरह 
ये कौन है जो हममें  रहकर  भी
अज्ञात की तरह जीता  है....
ये कौन अज्ञात है जो 
हरदम मुझे बुलाता रहता है
मेरे भीतर एक झरने की भांति
अनवरत छलछलाता रहता है.....!!!    
http://baatpuraanihai.blogspot.com/

Wednesday, December 8, 2010

तो फिर मत आईये ना राष्ट्रपति जी यहाँ......!!!
             क्या आपको यह पता भी है ओ राष्ट्रपति जी कि आप जहां आने वाले हो ,वहां आपके आने की ख़ुशी में हज़ारों पेड़ सड़क से काट डाले गए हैं ?क्या पेड़ में आपके दुश्मन छुपे हुए होंगे ,जो आपका इंतज़ार कर रहे होंओं,कि कब आप आओ और वो आपका काम तमाम कर डालें ? 
            क्या आपको यह पता भी है ओ राष्ट्रपति जी कि आप जहां आने वाले हो ,वहां आपकी सुरक्षा के लिए जो एहतियात किये जा रहे हैं,जो रिहर्सल की जा रही है ,उससे स्कूल के बच्चों के बसें सड़क पर घंटे-घंटे भर के लिए ठहर जा रही हैं और उनमें बैठे बच्चे भूख से तड़प रहे हैं और उनके माँ-बाप बस-स्टोपेज पर हैरान-परेशान घूम रहें हैं ??
            क्या आपको यह पता भी है ओ राष्ट्रपति जी कि आप जहां आने वाले हो ,वहां का जन-जीवन आपकी सुरक्षा के लिए असामान्य बना दिया गया है ,वह तो तब है जबकि आप आये भी नहीं हो ,जिस दिन आप आओगे,उस दिन एयर-पोर्ट से राजभवन तक और फिर राजभवन से रांची-यूनिवर्सिटी तक चक्का-जाम जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाने वाली है....इसके अलावा आम लोगों पर पुलिस का जलवा तारी होगा सो अलग....!!
                 अगर आपके आने का यही मतलब है ओ राष्ट्रपति जी ,तो फिर मेरे शहर के बच्चे ,उनके अभिभावक,आम आदमी और खुद मेरी आपसे यह विनम्र अपील है कि आप ना ही आओ तो अच्छा है !!क्यूंकि राष्ट्र के नेता  राष्ट्र और उसकी जनता की हिफाजत के लिए होते हैं ,जिन्हें जनता ने अपनी सेवा के लिए और राष्ट्र को संप्रभु बनाए रखने के लिए तैनात किया होता है और अगर राष्ट्र के वे नेता अपने ही राष्ट्र में इतने ही असुरक्षित हैं तो फिर अपने महलों में ही महदूद क्यूँ ना रहें...क्यों बाहर निकल कर अपने लिए असुरक्षा और जनता के लिए सर-दर्द मोल लेते हैं....आमीन....!!

रोइए जार-जार क्या....कीजिये हाय-हाय क्यूँ !!!


                      रोइए जार-जार क्या....कीजिये हाय-हाय क्यूँ !!
बड़ा शोर सुन रहा हूँ इन दिनों स्पेक्ट्रम वगैरह-वगैरह का.....मन ही नहीं करता कि कुछ लिखूं....हमारा लिखना कुछ यूँ है कि हमारे जैसे ना जाने लिखते-चीखते-चिल्लाते रह जाते हैं....और घोटाले करने वाले घोटाले कर-कर के नहीं अघाते हैं....बड़े-बड़े अफसर फाईलों पर अपनी चेतावनी की कलम चलाते हैं....मगर किसी साले का कुछ नहीं बिगाड़ पाते हैं....कोई अफसर अंगुली उठाता है तो अपने महकमे से बाहर कर दिया जाता है....और तो और कोई प्रधानमन्त्री नाम का कोई शख्स भी जवाब माँगता है तो उलटे हाथ खरी-खोटी सुनकर हाथ मलता रहा जाता जाता है....आप देखिये कितना विकेंद्रीकृत हो गया सब कुछ.....जब पी.एम.नुमा जीव भी किसी अदने से मंत्री की फटकार सुनकर चुप रह जाता है.....और बरसों अपनी जीभ सीए रहता है कुछ इस तरह....जैसे कि मूंह में जुबां ही ना हो....और फिर एक दिन जुबां खोलता भी है तो इस तरह....जैसे कोई भीगी बिल्ली हो.....दोस्तों प्रधानमन्त्री नाम के इस शब्द का पराभव हो चुका है भारत के इस शासन काल में....इतना विगलित हो जाने से अच्छा किसी भी प्रधानमन्त्री के लिए आत्महत्या कर लेना होता....मगर इस प्रकार की हरकतें करके उन्होंने ना सिर्फ इस पद का बल्कि अपनी खुद की निजी इज्जत का,समूचे देश के सम्मान का.....और देश की समूची जनता के सर को शर्म से नीचा कर दिया है.....जनता कुछ समय बाद सब कुछ भूलभाल कर बेशक उन्हें  कभी माफ़ भी कर दे....मगर इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा....!!
                    दोस्तों कभी-कभी आप निजी तौर पर गद्दार नहीं होते हुए भी गद्दार से भी ज्यादा हो जाते हैं...और इस गद्दारी को भले ही परिभाषित नहीं किया जा सके मगर....मगर इस कालिमा के छींटे हमेशा-हमेशा के लिए आपके दामन पर छा जाते हैं....आप बेशक खुद को सबूतों के अभाव में निष्कलंक बताते रहें....मगर मुर्ख से मुर्ख जनता भी जानती है कि दरअसल हो क्या रहा है....और जो हो रहा है....उससे जनता की आँखे भले ही कुछ देर से खुल रही हैं....मगर जब पूरी तरह खुल जायेंगी तो वह सबको दौड़ा-दौड़ा कर मारेगी.....बेईमानों को भी और इमानदारी का नकाब पहने हुए गद्दारों को भी....और यह सच होकर ही रहेगा....!!!!

Sunday, December 5, 2010

 आखिर किसको बदलना चाहते हैं आप ?? 
                   अभी-अभी एक मित्र के घर से चला आ रहा हूँ,अवसर था उसके दादाजी की मृत्यु पर घर पर बैठकी का...और इस संवेदनशील अवसर पर उस मित्र से जो कहा गया,उस पर सोच-सोच कर अचंभित-व्यथित और क्रोधित हुआ जा रहा हूँ,मेरे उस मित्र ने प्रेम विवाह किया है,जिसे उसके घर वालों ने कभी मन से स्वीकार नहीं किया,हालांकि मित्र अपनी पत्नी सहित अपने परिवार के घर यानी कि अपने ही घर में रहता है,मगर पत्नी के घरवालों को इस घर द्वारा कभी स्वीकार नहीं किया गया है और अब जब मित्र के दादाजी की मृत्यु हुई है और उसके ससुराल वाले बैठकी पर उपस्थित हुए तो उनके चले जाने के बाद मित्र के घरवालों द्वारा मित्र को यह कहा गया कि अपने ससुरालवालों से यह कह दे कि आज भर आ गए सो आ गए मगर अब टीके-पगड़ी की रस्म के वक्त वो टीका लेकर ना उपस्थित हों जाएँ.....और तब से मेरा मन बड़ा विचलित है.....कारण कि इतनी तेजी से बदलती दुनिया में आज भी एक अदना सा इंसान किसी दूसरे इंसान को इंसान नहीं समझता...तरह- तरह के अभिमानों से भरा यह इंसान अपने तरह-तरह के गुट बनाए हुए अपने उस गुट में पूरी तरह रमा हुआ अपनी उस दुनिया में पूरी तरह डूबा हुआ रहता है...और उससे इत्तर दुनिया से उसे कोई मतलब नहीं होता और तो और वह किसी और की कोई परवाह तक नहीं करता....अपने अभिमान,अपनी ठसक,अपना पैसा और अपना समाज बस यहीं तक उसे सब कुछ ठीक लगता है और इसके पार सब कुछ एक मजाक...बल्कि हीन....बल्कि कुरूप....बल्कि घृणा से भरा हुआ.....बल्कि उस पर थूक देने लायक.....यहाँ दूसरे को सम्मान देना तो दूर एक मिनिमम कटसी भी मेंटेन नहीं रखी जा सकती.....और हम हमेशा समाज को बदलने की बात करते हैं....!!
                          आखिर किस समाज को बदलना चाहते हैं हम और आप....यहाँ जहां तरह-तरह की घृणा और वैमनस्य भरा हुआ है....हम हमेशा राजनैतिक भ्रष्टाचार को गालियाँ दिया करते हैं...,मगर हम अपने खुद के बीच जो तरह-तरह की सामाजिक विसंगतियां....अंधविश्वास...अविश्वास....वहम.....गलतफहमियाँ और पता नहीं किन-किन बेवजह की बातों पर किन-किन से बेवजह घृणा का एक अंतहीन सैलाब अपने-अपने मन में ना सिर्फ पाले बैठे हैं....बल्कि उसे दिन पर दिन पाल-पोष कर और भी बढाए चले जाते हैं,उसका क्या ??किसी दूसरे की बात तो क्या करें हम... अपने किसी गरीब या कमतर-कमजोर या कम बुद्धि वाले किसी रिश्तेदार के साथ कैसा सुलूक होता है हमारा...क्या हम उसके साथ दो भात का व्यवहार नहीं करते....क्या उसके साथ का देन-लेन उसकी हैसियत देखकर नहीं करते....क्या उसका माथा देखकर उसे तिलक नहीं करते....अपने इस आचरण को हम भला कब देख पाते हैं....क्या जिन्दगी भर हम अपना खुद का यह चरित्रहीन आचरण देख भी पाते हैं....??उसे सुधारना तो बहुत दूर की बात है......!!!
                         दोस्तों हो सकता है कि हमने अपने समूचे जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं चाहा हो....और ना ही अपने जानते किसी का बुरा किया भी हो....और यहाँ तक कि हम मुक्त हस्त से दान भी देते आयें हों...और किसी की गरीबी पर हमारी आँख भी भर आयीं हों....और हमने बेशक तब उसके भले के लिए बहुत कुछ किया हो.....यानी कि समूचे जीवन हमने अच्छा-ही-अच्छा काम किया हो,जिससे हमें सदा बडाई-ही-बडाई ही मिली हों.....और यहाँ तक कि हमने सदा साधू-संतों का सत्संग ही किया हो.....मगर अपने ही परिवार में किसी-ना-किसी प्रकार की गलतफहमियाँ पाल कर किसी अपने ही खून के साथ,या किसी भी अन्य के साथ  कोई अन्याय नहीं किया....??....कभी शांतचित्त से सोचकर देखें दोस्तों तो हम पायेंगे कि हाँ हमने ऐसा किया है....और दोस्तों सच बताऊँ....हमारे सब अच्छा कर्म करने के बावजूद हो सकता है.....कि हमारे सारे पुण्य हमारे द्वारा किये गए इन अनजाने पापों द्वारा कट गए हों....अगर अगर हम कभी भी एक बार भी इस तरह से सोच पायें....तो हो सकता है कि कि हम अपने कुछ पापों को त्याग पायें....वरना किसी को गालियाँ देना उतना ही बेकार है....जितना कि किसी भैंस के आगे बीन बजाना.....और सच बताऊँ  तो ऐसा कोई कर्म या व्यवहार करने के बाद हम किसी भी समाज,सत्ता,राजनीति या किसी को गालियाँ बकने के हकदार भी नहीं रह जाते....बाकी हमारी मर्जी है,हम चाहे जो करें....हम रसूखवाले लोगों को टोकने वाला भला है ही कौन....सिवाय हमारी आत्मा के....अगर हम उस आत्मा की किसी भी किस्म की आवाज़ को सुनने में सक्षम नहीं....तो मैं आपसे....हम सबसे यही पूछ कर अपनी बात ख़त्म करना चाहूँगा कि आखिर किसको बदलना चाहते हैं.....हम....और आप.....!!!!!