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Monday, September 6, 2010

एक देश-द्रोही का पत्र..........सरकार बनाने वालों के नाम.....!!!


Monday, September 6, 2010

एक देश-द्रोही का पत्र..........सरकार बनाने वालों के नाम.....!!

मेरे प्यारे सम्मानीय दोस्तों......
सचमुच मैं ऐसा मानता हूँ कि हमारे देश में कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जिसके लिए समस्याओं का पहाड़ बना दिया जाए....मगर हम देखते हैं कि ऐसा ही है....और ऐसा देखते वक्त अक्सर मेरी आँखें छलछलाई जाती हैं....मगर शायद मैं भी देश के कतिपय उन कुछ कायर लोगों में से एक हूँ....जो डफली तो बहुत बजाते हैं....मगर उसमें से कोई राग नहीं पैदा होता....और ना ही अपने खोखे से निकल कर किसी चौराहे पर आते हैं कि जिससे कोई आवाज़ कहीं तक भी पहुंचे मगर उफ़ किसी की कोई आवाज़ कहीं तक भी नहीं पहुँचती....अक्सर ऐसा लगता है कि हम पागल कुत्तों की तरह बेकार ही भूंक रहे हैं....क्योंकि जिनको सुनाने के लिए हम भूंके जा रहे हैं...उनके कानों में जूं तो क्या रेंगेगी...शायद उनतक हमारी आवाज़ पहुँचती ही नहीं.....मगर मैं देख रहा हूँ कि कब तक नीरो चैन की बंशी बजाता रहेगा....कब तक हम सोते रहेंगे....मगर दोस्तों इतना तो तय जानिये जिस दिन हमारी आँख खुलेगी....उस दिन इन नीरों को अपनी बंशी छोड़कर घुटनों के बल चलकर हम तक आना होगा....और देखिये कि कब तक हम इस कुंभकर्णी नींद में सोये रहते हैं....!!!!बाकी आपके द्वारा इस नाचीज़ के विचारों को सम्मान दिए जाने पर मैं अभिभूत हूँ....आप विचार का सम्मान अब तक करते हो...तो इतना तो जाहिर है कि लौ अभी बुझी नहीं है....बस उसे थोड़ा हवा दिए जाने की जरुरत है....और बस.....आग लग जानी है....इस सिलसिले में मैं अपना यह आलेख भी आप तक पहुंचा रहा हूँ....!!
                                        एक देश-द्रोही का पत्र..........सरकार बनाने वालों के नाम.....!!
क्यूं सरकार बनाना चाहते हैं आप सरकार.....??
                         ....हे सरकार बनाने वालों....इधर देख रहा हूं कि बडी छ्टफटी लगी हुई है आप सबको सरकार बनाने की,क्यूं माई बाप ऐसी भी क्या हड्बडी हो गयी है अचानक आप सबको...कि आव-न-देखा ताव...वाली धून में आप सब सरकार बनाने को व्याकुल हो रहे हो,यहां तक किसी अंधे को भी आप सबों की यह व्यग्रता दिखाई पड रही है.किसी को समझ ही नहीं आ रहा है कि यकायक ऐसा क्या घट गया कि आप सब ऐसे बावले हुए जा रहे हो सरकार बनाने के लिये....लेकिन हां,कुछ-कुछ तो हम सब्को समझ आ ही रहा है कि यह सब क्यूं हो रहा है...!!
             आप सब पर शायद आप सबके द्वारा किए गये घोटालों की तलवार लटक रही है ना शायद....आप सब वही है ना जो अभी से दस साल पहले से लेकर अभी कुछ दिनों पूर्व तक एक-एक कर बने दलीय या निर्दलीय मुख्यमंत्री थे..और उस दौरान आप और आपके साथियों ने क्या-क्या गुल-गपाडा किया था क्या आप सब उस सबको भूल गये...या आप चाहते हैं कि जनता उसे भूल जाये ...!!हा....हा....हा....हा....हा....मैं भी क्या-क्या बके जा रहा हूं....जनता तो वैसे ही सब कुछ भूल जाती है....तभी तो बार-बार आप सबों से धोखा खाने के बावजूद बार-बार आप सबमें से उलट-पुलट कर फिर-फिर से उन्हीं कुछ लोगों को वापस वहीं भेज देती है,जहां से अभी-अभी कुछ दिनों पहले ही लुट-पिट कर आयी थी....पता नहीं क्यों भारत की जनता के दिल में विश्वास नाम की चीज़ जाने किस अकूत मात्रा में ठूस-ठूस कर भरी हुई है कि साला खत्म ही नहीं होने को आता....और इसी के चलते पिछली बार ही चुनाव में हारा व्यक्ति इस बार फिर से जीत कर ठसके से संसद या विधान-सभा में जा पहुंचता है...और किसी की आंखे भी नहीं फटती...!!
                         पता नहीं क्यों यह कुडमगज जनता ऐसा क्यों सोचती है कि इस बार यह आदमी सुधर गया होगा....इस बार "सार" ई बबुआ सुधरिए गया होगा....और सत्ता के खेल के पिछ्वाडे में फिर से वही कुचक्र रचा जाने लगता है...फिर से राज्य-देश और संविधान के "पिछ्वाडे" में लातें जमायी जाने लगती हैं...और किसी भी माई के लाल को कभी भी यह अहसास नहीं हो पाता कि वह भी इसी मिट्टी की संतान है....और अभी कुछ दिनों पहले वह भी यहां के स्थानीय लोगों के साथ...जनम-जनम के साथ की तरह रहा करता था....यहीं की बोली-चाली में रचा-पगा वह यहीं के लोगों के साथ यहीं के वार-त्योहार मनाता था और यहीं के लोगों के दुख-दर्द-हारी-बीमारी-पीडा-म्रत्यु आदि में शरीक हुआ करता था...ऐसा लगता है कि राजनीति को उसने अपने "लिफ़्ट" कराने भर की सीढी मात्र बनाया हुआ था...और लिफ़्ट होते ही उसका इस परिवेश से-इस वातावरण से-इस सहभागिता से नाता ही टूट गया...किसी नयी दुल्हन बनी  लड्की की तरह...जैसे एक लडकी अपनी शादी के तुरंत पश्चात अपने पति के घर के नये वातावरण- नये परिवेश के अनुसार खुद को ढाल लेती है यहां तक कि थोडे ही दिनों में अपने बाबुल के घर कभी-कभार आने के अलावा सभी नातों से विरक्त हो जाती है...आप सब भी हे सरकार बनाने वालों शायद ठीक वैसे ही लगते हो मुझे....लेकिन दुल्हन का यह जो उदाहरण दिया है मैंने,यह अधुरा है अभी क्योंकि पूरी बात तो यह है कि यह दुल्हन ज्यादातर अपने घर को बनाती है,इसकी रखवाली करती है....इसके वंश को बढाती है....वंशजों को पालती है-पोषती है,उनकी रखवाली करती है...अपना खून भी देना पडे तो देकर उस घर की रक्षा करती है...!!
                             तुम जरा सोचो ओ सरकार बनाने वालों कि यदि यह दुल्हन अगर तुम्हारी तरह हरामखोर या विभीषण हो जाए तब....!!तब क्या होगा...??अरे होगा क्या....तुम्हारी संताने नाजायज होंगी और तुम्हे पता भी नहीं होगा....!!तुम्हारे सच्चे वंश का भी तुम्हे पता ना होगा....क्या तुमने कभी सपने में भी यह सोचा या चाहा है कि तुम्हारे घर में कभी ऐसा हो...तुम्हारी दुल्हन कोई वेश्या या दुश्चचरित्र हो....!!...अगर नहीं...तो ओ सरकार बनाने वालों....तुम अपने राज्य या देश रूपी घर के लिए ऐसा क्यूं और कैसे सोचा करते हो....और दिन-रात...अपने देश और राज्य के प्रति दुश्च्रित्रिय आचरण कैसे किया करते हो...??क्या तुम्हें इस बात का कोई भान भी है कि इसका असर तुम्हारे खुद के वंशजों पर क्या पडेगा....कभी तुमने ऐसा सोचकर देखा भी है कि कल को तुम्हारे बच्चे किसी स्कूल में पढ रहे हों या सडक पर कहीं जा रहे हों और उनके पीछे अचानक यह जुमला उनके कानों में आ पडे..."देखो हरामखोर की औलाद....!!""देखो वो जा रही उस साले हरामजादे की बेटी,पता है इसकी मां....!!""वो देखो...वो देखो क्या पहलवान बना फिर रहा साला....साला मर्सिडीज बेंज दिखाता है....बाप की हराम की कमाई...!!"
                लेकिन ये जुमले तो बडे साधारण हैं...आप कल्पना करो कि कैसे-कैसे और कितने-कितने गन्दे जुमले तुम्हारे बच्चे-बच्चियों के लिए सरे-राह,सरे-आम और किस टोन में इस्तेमाल किए जा सकते हैं...!!और तुम्हारी खून और वीर्य से उत्पन्न वो सन्तानें किस कदर शर्म से पानी-पानी हो सकती हैं....दोस्तों...जरा यह भी सोचो कि ऐसे वक्त उन पर क्या गुजरेगी,सो कोल्ड जिनके लिए-जिनकी खुशी के लिए तुम सब इन गन्दे कार्यों को अंजाम दे रहे हो.....!!!   
                             तुम सब अगर अपने लिए और अपने बच्चों के लिए उज्जवल और प्यारा भविष्य चाहते हो तो अपने राज्य-अपने देश को अपने माँ-बात की तरह इज्ज़त दो सम्मान दो....इसके निवासियों का हक़ लूटने के बजाय इनकी सच्ची रहनुमाई करो...इनकी खातिर और इनके हक़ का कार्य करो....अरे पागलों पैसा तो तब भी तुम्हारे हाथ पर्याप्त आ जाएगा....तुम क्यों हाय-पैसा--हाय पैसा किए जाते हो...क्यूँ नहीं समझते कि ये पैसा तुम्हारे भविष्य का कटु अन्धकार है...और तुम्हारी संतानों के लिए घोर श्रम से डूब मरने का एक साधन...अगर तुम्हें अपने आने वाले भविष्य के लिए गदगी ही छोडनी है तब तो कुछ कहा और किया नहीं जा सकता...मगर अगर सच में तुम्हें देश में पीडी-दर-पीडी अमर होना है और वो भी अपने नाम की सुन्दरता के रूप में तो मेरे अनाम भाईयों ओ सरकार बनाने वालों,अपने शौर्य को राज्य और देश की बेहतरी की खातिर खर्च करो....और देखना अगर तुम स्वर्ग के आसमान देख पाए तो,कि तुम्हारी संतानें तुम्हारे नाम पर क्या गर्वोन्मत्त जीवन जी पा रही है.....और सर उठाकर सबसे कहे जा रही कि हाँ....देखो यह हमारे पापा ने किया था.....देखो ये काम मेरे दादाजी ने किया था....!!!

Monday, August 30, 2010

main......भूत बोल रहा हूँ..........!!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
इक पागलपन चाहिये कि चैन से जी सकूं…
सब कुछ देखते हुए इस तरह जीया ही नहीं जाता…।
मैं गुमशुदा-सा हुआ जा रहा हूं,
अपनी बहुतेरी गहरी बेचैनियों के बीच…
अच्छा होने की ख्वाहिश चैन से जीने नहीं देती…
और बुरा मुझसे हुआ नहीं जा सकता…
तमाम बुरी चीज़ों के बीच फ़िर कैसे जिया सकता है ??
और सब कुछ को अपनी ही हैरान आंखों से…
देखते हुए भी अनदेखा कैसे किया सकता है…??
अगर मैं वाकई दिमागी तौर पर बेहतर हूं…
तो लगातार कैसे अ-बेहतर चीज़ें जैसे
घटिया व्यवहार,घटिया वस्तुएं,
घटिया लोग,प्रेम से रिक्त ह्रदय
एक-दूसरे से नफ़रत से भरे चेहरे
और भी इसी तरह की कई तरह की…
असामान्य और अमान्य किस्म की बातें…
किस तरह झेली जा सकती हैं आसानी से…
और जो अगर इस तरह नहीं किया जा सकता है…
तो फिर कैसे निकाला जा सकता है यह समय्…
जो मेरे आसपास से होकर धड़ल्ले से गुजर रहा है बेखट्के
मुझे समझ नहीं आता बिल्कुल कि किस तरह
आखिर किस तरह से बिना महसूस किये हुए गुजर जाने दूं…
और अगर महसूस करूं तो सामान्य कैसे रह पाउं…??
इसिलिये…हां सिर्फ़ इसिलिये पागल हो जाना चाहता हूं…
कि सब कुछ मेरे महसूस हुए बगैर
मेरे आसपास तो क्या कहीं से भी गुजर जाये…

आंखे खुली रखते हुए अन्धा हो जाना कठिन होता है बड़ा…
आंखों के साथ आप लाठी पकड़ कर नहीं चल सकते…
और हम सब आज इसी तरह चल रहे हैं बरसों से…
अगर इसी तरह का अन्धापन हमें वाजिब लगता है…
तो सच में ही अंधे हो जाने में क्या हर्ज़ है…
इसी तरह का पागल्पन हमें भाता है…तो फ़िर
सच में भी पागल हो जाने में क्या हर्ज़ है…!!
मैं पागल हो जाना चाहता हूं.…
हां…सच मैं पागल हो जाना चाहता हूं…
कि चैन से जी सकूं…
कि मरने के बाद आकर यह कह सकूं…
मैं क्या करता या कर सकता था…
मैं तो जन्मजात ही पागल था…
दुनिया में सभी इसी तरह जी रहे थे…
एक पागल क्या खा कर कुछ कर लेता…!!??  

Saturday, August 14, 2010

लेकिन राहुल,तुम करोगे आखिर क्या....???



मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
लेकिन राहुल,तुम करोगे आखिर क्या....??

प्रिय राहुल, अभी-अभी अखबार में यह खबर पढी कि तुम प्रधानमंत्री बनने के लिए देश के लोगों की सर्वोच्च पसंद हो,कोई उनतीस फ़ीसदी लोगों की पसंद और यह भी कि तुमने इस पद के अन्य दावेदारों यथा सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को पीछे छोड दिया है....किसी और दल के किसी व्यक्ति का तो अब इस पद को पाने का कोई उपाय ही नहीं,क्योंकि तुम्हारी वर्तमान लोकप्रियता के सम्मुख कोई कहीं नहीं ठहरता,तो यह प्रश्न स्वयं ही पैदा हो जाता है कि आखिर प्रधानमंत्री बनकर आखिर तुम करोगे तो करोगे क्या,तुम्हारी सोच क्या है,तुम्हारी देशना क्या है,तुममें देश के प्रति जज्बा क्या है और इसकी समस्याओं की जानकारी कितनी है,आखिर इन्हीं सवालों के उत्तर में तुम्हारे खुद के प्रधानमंत्री होने के औचित्य से अधिक देश को उसकी प्राथमिकताओं के आधार पर उसकी समस्याओं को हल में निहित है इस पद का औचित्य...!!पुन:,यह भी तय है कि इस देश की भोली-अनपढ और भावुक जनता आने वाले दिनों में तुम्हें इस "राजगद्दी" का वास्तविक हकदार समझते हुए इसे तुम्हें(प्रकारांतर से तुम्हारी मम्मी को)सौंप भी दे,जैसा कि वह विगत में करती भी आयी है तो तुम वही करने वाले हो जैसा कि विगत की सारी सरकारें करती हुई आयी हैं अथवा सचमुच तुम्हारे दिल में इस देश का कोई अदभुत भविष्य हिलोरे ले रहा है,जिसे कि साकार करने हेतु राजनीति के इस मैदान में,इस घमासान में कूद पडे हो...??यह हम नहीं जानते और सच तो यह है कि किसी के बारे में कुच नहीं जानते....और किसी को भी महज उसके भाषणों के आधार पर वोट दे डालते हैं,बिना उसकी कोई पड्ताल किये...और देश को स्वाधीनता दिलाने वाली इस कांग्रेस को तो हम खुद ही देश की बपौती मानते हैं,बिना यह जाने कि इसी कांग्रेस ने आज़ादी के बाद देश के कुछ किया भी है या इसकी जडों में सिर्फ़ मठ्ठा ही डाला है, मगर उसके बावजूद भी ओ राहुल मैं जानता हूं कि देश के अगले प्रधानमंत्री तुम्ही हो,क्योंकि मैं इस देश की जनता को जानता हूं तथा साथ ही साथ तुम्हारी कांग्रेस की सारी नौटंकियों को भी जानता और परखता हुं !!
अब देखो ना,मेरे(मतलब देश की समुची सोयी हुई जनता के) प्रश्न के उत्तर में यह भी तय है कि तुम बजाय उत्तर देने के उल्टे हमीं से प्रश्न करने लगो कि किसी युवराज या राजकुमार से ऐसे भद्दे सवाल पूछ्ने वाले हम होते कौन हैं,या फिर यह भी कि ऐसे सवाल हमने विगत में किसी से क्युं नहीं पूछे,किसी भी नेता से उसकी देशभक्ति का प्रमाण क्यूं नहीं मांगा.....कभी-कभी गलत समय पर सवाल पूछे जाने पर सवाल अनपेक्षित रूप से भडकाऊ हो जाता है,है ना राहुल...??मगर प्यारे राहुल,सवाल तो किसी भी वक्त उठाया जा सकता है,है कि नहीं...!!और उठाये गये सवाल के जवाब किसी जनप्रतिनिधि से ही क्यूं,किसी संभावित जनप्रतिनिधि से भी उतने ही अपेक्षित होते हैं,होते हैं ना राहुल..??अलबत्ता तो राहुल इस देश में सवाल ही बहुत कम पूछे गये हैं किसी से मगर उससे भी बडा दुर्भाग्य तो यह कि किसी के द्वारा किसी भी सवाल का कोई यथोचित जवाब ना दिये जाने के कारण यह देश,जिसे श्रद्दा से कभी हमने अपना वतन कह डाला है(उफ़ कह डाला था कहना था..!!),प्रश्नों के ऐसे अनसुलझे चौराहों से जा फंसा है,जिसे संभवत: कोई युवा ही सुलझा सकता है,सूझ-शक्ति-दूरदर्शिता-आत्मबल-स्वाभिमान-गौरव-जमीनी सच्चाईयों की समझ रखने वाला एक समष्टिकेंद्रित युवा ही सुलझा सकता है,और सच तो यह है कि अरबों की जनसंख्या वाले इस देश में वह युवा कोई भी हो सकता है,यहां तक कि तुम स्वयम भी....!!
तो राहुल,इस देश की समस्याएं क्या हैं,यह बार-बार तुम्हे बतलाकर तुम्हारा और मेरा वक्त जाया नहीं करना चाहता...मगर हां,तुम्हे यह बताना चाहता हूं कि उससे बडी समस्या,दरअसल सबसे बडी समस्या ही वह राजनीति है जिससे तुम्हारी ही भाषा में कहूं तो तुम "बिलोंग" करते हो, जिसमें कि तुम रचे-पगे हो,जो कि तुम्हारे आस-पास है और जिसका कि इस देश में सर्वत्र राज है,जो चौकडी तुम्हारे एन बगल में हैं और सबसे बडी और दुखदायी तो यह कि जिस "धन-बल" से यहां कि राजनीति चलती है,चल रही है...और शायद तुम्हारे होने के बावजुद भी चलेगी और जिसे कि तुम खुद भी इसी तरह हांकोगे...जो कि सुगम है,जो कि सरल है,या जो कि मलाईदार है....??क्या तुम अपने आसपास उन्ही लोगों को रखनेवाले हो,जिन्होने इस देश का खून चूस-चूस कर इतना धन और ताकत इकठ्ठा कर ली है कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड सके यहां तक कि कानून भी नहीं....भले अपवादस्वरूप कुछ भी होता दिखायी दे जाये...जो अब भी यही कर रहे हैं..जो आगे भी यही करेंगे.....क्योंकि इसके अलावा वे कुछ भी नहीं जानते... क्योंकि इसके अलावा उन्होने कुछ सीखा ही नहीं...क्योंकि महज अपने बीवी-बच्चों और परिवार-भर का पेट भरने के लिए उन्हें कुछ और सीखने की आवश्यकता भी नहीं थी...क्योंकि हरामखोरी दरअसल ज्यादा आसान होती है और वह हरामखोरी तो और भी ज्यादा,जिसके लिए किसी को कोई जवाब तक ना देना पड्ता हो और यहां तक कि गलती से कोई सिरफ़िरा जवाब मांग बैठे तो उसे उपर से छ: इंच छोटा कर डालने की "सलाह" तक दी जाती हो...दरअसल सत्ता और उसके साधनों की बन्दरबांट में जुटे हुए इन बन्दरों को नचाने में काबिल,इन अति महत्वपूर्ण मगर देश की नज़र में मलेच्छ लोगों को नचाने में तुम्हारी काबिलियत मुझे सन्देह है राहूल.....!!
तुम्हारे बाबुजी ने,ओ राहुल,एक बार सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि केन्द्र से चला एक रुपया आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते पन्द्रह पैसे बन जाता है....वैसे इस कथन में मुझे पन्द्रह पैसे वाले हिस्से पर भी एतराज है....मेरा सन्देह है कि दरअसल पांच पैसा ही सही जगह तक पहुंच पाता है और राहूल इस धत्तकरम के जिम्मेवार कौन लोग हैं...किस चौकडी का किया-धरा है यह सब....कहा ना,मैं बार-बार तुम्हे बता कर तुम्हारा और मेरा वक्त जाया नहीं करना चाहता....बस तुमसे इतना पूछ्ने में ही मेरा जोर है कि इस हकीकत का-इस सच्चाई का-इन तथ्यों के मद्देनज़र तुम्हारे मन में कोई उपयुक्त विचार भी है अथवा नहीं....कि बस यों ही खाली-पीली......!!राहुल सच्चाई तो यह है की आज की तारीख में अगर ऐसे लोगों के खिलाफ अगर कार्रवाई की जाए तो दल के दल खाली हो जायेंगे...कोई साफ़-सुथरा आदमी दिखाई ही नहीं देगा....ऐसे में बताओ ना राहुल कि इस राजनीति में और इस राजनीति का तुम करोगे तो करोगे आखिर क्या....??किस तरह इस गंद भरे कचड़े को साफ़ करोगे...किन लोगों को तरजीह दोगे....और किन्हें वनवास...या सब कुछ इसी तरह चलता रहना है...ज्यादा उम्मीद तो इसी बात की लगती है..जिन शेरोन के मुहं में खून लग चुका हो वो भला घास खायेंगे....और यदि ऐसा ही है तो तुम्हारे राजनीति में पदार्पण को लेकर इतना शोर-शराबा किस बात का....तुम्हारे पी.एम्.बनने-ना-बनने को लेकर इतना हंगामा क्यूँ....!!इस हंगामे को रोको यार....थोड़ा भी देश के मान का तुम्हें भान है...तो इसकी जड़ों से जुडो....इन्हें सींचो...तब तुम खुद को मुंह दिखाने के योग्य रह सकोगे....और देश का थोडा-बहुत भी अगर भला हो पाया,तो इस देश की आगामी संताने तुम्हें याद करेगी..इस देश के वतमान बुजुर्ग तुम्हें तहे-दिल से शत-शत आशीर्वाद देंगे...और हम भी तुम्हे सैल्यूट करेंगे....सच राहुल भाई....!!

Wednesday, August 4, 2010

चीन से तुलना करते हैं आप अपनी....हा...हा....हा....हा....!!!!






मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
                                                 चीन से तुलना करते हैं आप अपनी....हा...हा....हा....हा....!!
                     इधर देख रहा हूं कि चीन को लेकर बहुत गहमा-गहमी है विचार-जगत में......यानी कि मीडिया जगत में और भारत तो विचार-जगत की दृष्टि से सदा ही सर्वोपरी रहा है...विचार-जगत की इसकी तमाम नदियां सदा-नीरा हैं,सनातन काल से बहती आयी हैं और शायद अनन्त-काल तक बहने वाली हैं...!!हो सकता है,भले उनका जल गंदला गया हो,भले वो एक नाले के रूप में परिणत हों गयीं हों,भले ही उनमें तमाम तरह की गंदगी समा चुकीं  हों,भले ही वो एक सडे हुए नाले की तरह हो चुकीं हों,जिसमें कीचड ही कीचड हो,पानी का कहीं नामो-निशान ही ना दिखायी दे आपको....और यह भी हो सकता है कि ये नदियां आपको धरती पर न भी दिखायी दें मगर आप अगर उसके बहने वाली जगह या उसके आस-पास कई किलोमीटर तक खोदेंगे तो वहीं कहीं बहती हुई पायी जा सकती हैं लेकिन आपको मिलेगी अवश्य....!!
                        असल में हम दार्शनिक भारतीय लोग,जो नहीं है उसका होना साबित करने में उस्ताद हैं.....इसका अर्थ यह भी हुआ कि हम जो हैं,उसे इसे इसी वक्त झूठा साबित करने में भी उस्ताद हुए....सो चीन के मामले में भी हमने यही शुतुर्मुर्गी रवैया अपना रखा है,तो इसमें आश्चर्य ही कैसा...!!!
                     चीन ही क्या,जब हम किसी भी विकसित देश की बात करते हैं तो हमें यह अवश्य ही देखना होता है कि वहां की आम जनता अपने देश के प्रति कैसी है या कितनी होनहार है,क्युंकि सच तो यह है कि नेता भी तो उसी जनता से चुन कर आते हैं....तो नेता का जो चरित्र है वो दर असल जनता का ही चरित्र है और आम जनता से मेरा तात्पर्य सिर्फ़ भूखी-नंगी निम्न-वर्गीय जनता से नहीं है.....जनता का मतलब डाक्टर,इंजीनियर,वकील ,ठेकेदार , अफ़सर,व्यापारी,व्यवसायी,कलाकार....सब ही हैं....और मेरा तात्पर्य अन्तत: इस बात से है कि हम अपने देश के लिये क्या करना चाहते हैं, शब्दों की मौखिक खाना-पूर्ति,जो कि करने में हम उस्ताद हैं ही,या कि सचमुच ही ऐसे कार्य जिससे वाकई हमारी और हमारे देश की कद्र बढे....??चीन ने जो किया है या कोई भी देश जो भी करता है,वह ना सिर्फ़ वहां के शासकों का कच्चा चिठ्ठा होता है बल्कि वहां की जनता का भी रोजनामचा होता है और मुझे यह कहते हुए बडा दुख: होता है कि नेता तो नेता,हम सब भी अपने देश के प्रति ना सिर्फ़ ईमानदार भी नहीं हैं बल्कि रहमदिल भी नहीं हैं....!!
                      हम सब ऐसे हरामी लोग हैं जो अपनी हरामीपन्ती छिपाने के लिए सदा दूसरों की हरामीपन्ती को उघाडते रहते हैं और ना सिर्फ़ इतना ही बल्कि दूसरों को नंगा करने में तुले हुए हम लोग कभी यह सोचते तक नहीं कि हमारे द्वारा नंगा किये जाने वाले व्यक्ति की बिल्कुल एक कापी हैं हम....सो भी गंदी और घटिया नकल....हमें लगता है कि हम बडे अच्छे लोग हैं,किस बिना पर यह मुझे पता नहीं...मगर भ्रष्टाचार करते और उसे बढावा देते हुए हम...बेइमानी करते और चोरों के साथ गलबहियां करते हम....कामचोरी-निठल्लापन करते और औरों को ऐसा करने को उकसावा देते हम...इस प्रकार हर तरह के एकल और सामुहिक कुकर्म-दुष्कर्म करते और दिन-रात ऐसे ही लोगों की संगति में उठते-बैठते हुए हम....मतलब हम तरह-तरह के लोग अपने-आप में एक ऐसी चांडाल-चौकडी हैं,जिन्हे अपने हित,अपने स्वार्थ और अपना-अपना और अपना के सिवा कुछ दिखायी भी नहीं देता...कुछ लोग जो ऐसे नहीं हैं वे बेशक स्तुत्य हैं...मगर समाज उन्हें किनारे किये हुए है,क्योंकि उनकी नज़र समाज को बौना साबित करती है,और समाज के ”हितों" में बाधा भी आती है,सो कुछ करने वाले भले लोगों को तो समाज ने खुद ही सेन्ट्रिंग में डाल रखा है....बाकि के भले लोग ऐसे लोगों का हश्र देख कर खुद का मुंह सिए बैठे हैं...!!
              इस प्रकार समाज अपनी मनमानी करने में व्यस्त है....और इसी समाज से निकले नेता-अफ़सर यानि के समाज के राजनैतिक-सामाजिक नुमाईंदे अपनी मनमानी करने में....यह अव्यक्त पैकेज-डील बरसों से चली जा रही है....और तब तक चलती ही रहेगी....जब तक भारत का तमाम समाज यह ठान नहीं लेता कि उसे अब अपने लिए नहीं बल्कि देश के लिए जीना है....और ऐसा कुछ करते हुए जीते जाना है...जिससे सिर्फ़ अपना खुद का ही लाभ ना हो बल्कि देश का भी हित सधे....बाकि अगर सबके लिए सारा जीवन व्यापार ही है तब तो कुछ किया भी नहीं जा सकता है...तब आने वाले दिनों में यह देश खुद-ब-खुद अपनी मौत मर जायेगा....मगर अगर इसे जिलाये रखना है तो इसे अपनी देश-भक्ति की खुराक तो देनी ही पडेगी...वो भी सुबह-शाम भर नहीं बल्कि हर वक्त....चौबीसों घंटे....!!
                      बोलने में बडा आसान लगता है कि किसी ने यह कर लिया-वह कर लिया....कर तो हम भी सकते हैं मगर अगर सिर्फ़ मूंह खोलने-भर से सब कुछ हो जाया करता तो भारत आज निस्संदेह विश्व का सिरमौर होता.... क्योंकि इसके तो ग्रंथ-पर-ग्रंथ भरे पडे हैं विचारों के,ऐसे सनातन और शाश्वत ग्रन्थ,जिनकी दुहाईयां देते हमारे बुद्धिजीवी अघाते ही नहीं...बिना यह देखे और महसूस किए हुए कि ऐसे पठन-पाठन-श्रव्यन का क्या लाभ...जब आप अपने समाज-राज्य-देश के प्रति नैतिक ही नहीं हो सके....क्योंकि बरसों-बरस भारत की इस ज्ञान-संपदा के बारे में पढता आया हूँ...और इस ज्ञान-संपदा का एक-आध अंश का पठन-पाठन-वाचन श्रवण मैंने भी किया है....मगर उसका वास्तविक परिणाम मुझे भारत के घरातल पर दिखाई ही नहीं देता....जाति-परंपरा जिसका इतना गुणगान किया जाता है...उसका वास्तविक परिणाम सदियों की हमारी गुलामी के रूप में फलीभूत दिखाई देती है...मगर इसका इससे भी विकट परिणाम करोड़ों-करोड़ लोगों द्वारा अपना आत्माभिमान-स्वाभिमान और यहाँ तक कि अपने-अपने चरित्र के "ओरिजिनल''गुणों तक को खो देने में दृष्टिगोचर दिखाई देता है...करोड़ों लोगों द्वारा अपने वास्तविक चरित्र को खो देना अंततः भारत के चरित्र का भी पराभव है,दुखद तो यह है कि यह स्थिति आज तक कायम है...और जब तक ऐसा है भारत का वास्तविक उत्थान दूर-दूर तक संभव नहीं...हाँ सपने अवश्य देखें जा सकते हैं और मीडिया के द्वारा उसे भारत पर प्रत्यारोपित भी किया जा सकता है मगर असल भारत तो आज भी भूखा-नंगा-बदहाल भारत है....और जिनकी तरक्की को लेकर हम इतने उत्फुल्ल हैं...उसके पीछे के सच को सच में ही कोई उजागर कर दे तो......शायद बहुत से बड़े-महान और वैभवशाली लोगों की कलई एकदम से खुल जायेगी....यह है तथ्य....या सच्चाई या जो कहिये..!!
                     तो प्रश्न वहीँ आकर अपने जवाब ढूँढने लगाता है...कि चरित्र के बगैर कैसे आप महाशक्ति बन सकते हो...और चरित्र के बगैर आपकी गरदन सिर्फ ऐंठ के बल पर कितने दिनों तक ऊँची रह सकती है...एक महाशक्ति बनाने जा रहे देश के लाखों-लाख किसान आत्महत्या कर सकते हैं??करोड़ों लोग बेरोजगार...और करोड़ों लोग बीस रुपये पर बेगार खट सकते हैं...??करोड़ों लोग निरक्षर...स्वास्थ्यहीन...गरीबतम...अधिकारविहीन...दो जून का भोजन तक नसीब ना हो पाने वाली स्थिति में मर-मरकर जीने वाले हो सकते हैं....अगर यह सच होने जा रहा है,जैसा कि मीडिया सोचता है...जैसा कि सब्जबाग यह विश्व को दिखता है...तो धरती पर कभी गौरवशाली रह चुके राष्ट्र(????)के लिए इससे ज्यादा भद्दा मज़ाक कोई हो भी सकता है.....???    

Friday, July 30, 2010

तो फिर क्या आम आदमी ही देश द्रोही है .....???





तो फिर क्या आम आदमी ही देश द्रोही  है .....??

                          विकिलिक्स द्वारा अमेरिकी कारर्वाईयों के भंडाफ़ोड किये जाने और अमेरिकी सरकार द्वारा इसे संघीय व्यवस्था का उल्लंघन बताये जाने पर एक प्रश्न अपने-आप ही उठ खडा होता है कि क्या सिर्फ़ सरकारें ही व्यवस्था को बनाये रखती हैं,बाकि सब तंत्र उसका उल्लघंन ही करते हैं??
                             जबसे हमने लिखित इतिहास को पढा और उसके माध्यम से सब कालों में "सरकारों"का जो आचरण जाना और समझा है उससे तो ठीक उल्टा ही प्रमाणित होता है,अब तक के लिखित इतिहास के अनुसार हमने यही देखा है कि तरह-तरह की सरकारों ने किस-किस प्रकार के "सुनियोजित-कुकर्म" किये हैं और जब विभिन्न व्यक्तियों या किन्ही सामाजिक संगठनों ने उनके विरुद्द किसी भी प्रकार की आवाज़ उठायी या आंदोलन भी किया तो किस प्रकार से इस "सो-कोल्ड" सरकारों ने उनका गला घोंटा है या कि अपनी सेना और अपने अधीन तंत्र के द्वारा किस प्रकार की हिंसा के द्वारा कुचला है और मज़ा तो यह भी है कि यह सब आज इस "सो-कोल्ड’' या कहूं कि इस तथाकथित लोकतांत्रिक कहे जाने वाले "सभ्य" युग में भी हो रहा है,अंतर सिर्फ़ इतना है कि ऐसा आचरण करने वाली लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों का ढंग और कम्युनिस्ट सरकारों का ढंग एक-दूसरे थोडा अलग है.
             इससे कभी-कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक देशों में लोक-तंत्र का अर्थ महज इतना ही होता है कि नागरिक अपनी मनमानी करें और अगर सरकार को यह नागवार गुजरे तो वह अपनी मनमानी करे...फर्क सिर्फ़ इतना है कि सरकार की मनमानियां एक भयानक अत्याचार से भी भीषण हो सकती हैं,बाद में भले वह हटा दी जाये और बाद वाली सरकार उससे भी कमीनी साबित हो.....
             अब तक यही समझा जाता रहा है कि लोगों द्वारा चुनी गयी सरकारों में लोगों के हित ज्यादा सुरक्षित होते हैं,हालांकि ज्यादातर इतिहास इस बात की न सिर्फ़ तस्दीक नहीं करता बल्कि इसे नकारता भी है.सरकार के लोग,उपर से नीचे तक चाहे वो कोई भी हों,खुद के कर्म को उचित और आम नागरिक के कर्मों को ज्यादातर गलत बताते हैं....यह गलत होना गैर-कानूनी होने से लेकर देशद्रोह होना तक भी हो सकता है,यहां तक कि इसी तर्ज़ पर आज तक तमाम लोकतांत्रिक देशों के कानून उनके खुद के ही संविधान की धज्जियां उडाते दिखायी देते हैं.....और मज़ा यह है कि जिन कानूनों के बिना पर आम लोगों को कडी-से-कडी सज़ा तक दे दी जाती है....उन्हीं कानूनों की चिथडे उनके रखवाले हर वक्त करते हुए दिखायी देते हैं, मगर चुंकि हर आदमी अपनी ही समस्याओं से भरा उन्हें निपटाने में पगलाया रहता है.....उसे गरज़ ही नहीं होती इस सबको देखने की [जब तक कि वो खुद नहीं इस सब झमेले में फ़ंस जाये ]....और सिर्फ़ और सिर्फ़ इसीलिए यह सब चलता रहता है.....लोग आंख मूंद कर अपना-अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं....और सरकारी दुनिया में बिल्ली के भाग से छींका टूटता रहता है.....उस टूटे हुए छींके से ये सरकारी लोग [बिल्लियां]मलायी मार-मार कर खाते रहते हैं....यहां तक कि कोई आम नागरिक भी अगर इस मलायी को चाटना चाहे तो उसे निस्संदेह किसी ना किसी सरकारी हाथ की मदद का ही सहारा लेना होता है....मज़ा यह कि कल को अगर यह सब उजागर भी होता है तो इसका ठीकरा हर हालत में उस गैर-सरकारी व्यक्ति या समूह के माथे पर ही फ़ूटना होता है....अगर सरकारी हाथ कुछ ज्यादा ही काला हो गया हो तो तो सरकार खुद आगे बढ्कर उसे बचाया करती है...क्युंकि सरकार में भी तो ना जाने कितने ही पक्ष होते हैं,जिन्होने इस मलायी को चाटने में अपना भी मूंह मारा होता है......
           इसका सीधा मतलब आप यह भी लगा सकते हो कि सरकार का दामन हमेशा साफ़ ही होता है...हम जैसे हरामी-कमीने-बेईमान और भ्रष्ट लोग ही सरकार का मूंह काला किये जाते हैं[सरकार के साथ मूंह काला नहीं करते....!!!]और इसीलिये सरकार का विरोध करने वाले.....सरकार अलग सोचने वाले...सरकार से बिल्कुल ही भिन्न नीति रखने वाले....और सरकार के गलत कार्यों का विरोध करने वाले ना सिर्फ़ उसकी [गोपनीय]संघीय व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले समझे जाते हैं,अपितु देशद्रोही तक भी साबित किये जा सकते हैं......प्रत्येक सरकारी व्यक्ति,चाहे वह कितना ही अदना-सा....किसी भी सामान्य समझदारी का गैर-जानकार...या कि बिल्कुल ही टुच्ची सी समझ रखने वाला भी क्यों ना हो.....उसके अधिकार.. उसकी ताकत....उसका अहंकार....उसका रुतबा...उसकी कडकता....उसका रूआब....और सबसे बढ्कर ना जाने किन अनजान जगहों से आने वाला अथाह धन उसे हमसे इतर साबित करते हैं....मगर वह देश-द्रोही कभी नहीं कहला सकता....अगर कभी कहला भी गया तो यह माना जाता है कि जरूर ही उसके खिलाफ़ कोई गहरी राजनीतिक साजिश रची गयी है...और इसके पीछे अवश्य ही विपक्षी राजनीतिक दल है....और इस प्रकार उस गद्दार व्यक्ति या समूह इस तरह के तमाम देश-द्रोही कार्यों के प्रति आंख मूंद ली जाती है....और ऐसा क्यों ना हो.....आखिर उस हमाम में सभी शरीक जो हैं.....
           सरकार के अनुदान से चलने वाला बहुतेरा मीडिया भी इस हमाम का ही वासी ही होता है....इस मलायी का चटोरा.....सो एक तरफ़ मीडिया का एक हिस्सा उस गलत व्यक्ति/समूह या सरकार के इन कारनामों को उजागर कर रहा होता है....वहीं....यह मीडिया-विशेष अपनी पूरी ताकत और जद्दोजहद के संग उन गलत कार्यों में बराबर का भागीदार बन कर सरकार का वकील बनकर उन तमाम गलत पक्षों के पक्ष में तमाम निराधार और घटिया दलीलें पेश करता है....जिन्हें हम बराबर हरामीपने के कुतर्क साबित कर सकते हैं....और समय-समय पर ऐसा करते भी हैं......मगर ऐसा कब तक चले.....और क्योंकर चले.....??सरकारों का कार्य क्या सिर्फ़ हरामीपना करना है....??सरकारें क्या किसी और लोक से उतरी हैं और किसी के भी प्रति उत्तर्दायी नहीं हैं.....??और आम आदमी का कोई और काम नहीं है क्या,जो वह सरकारों और उससे जुडे तमाम लोगों पर नज़र रखे....और अपना महत्वपूर्ण काम-धाम छोड देने की कीमत चुका कर "ऐसे लोगों” की पोल खोजता चले.....??सरकारें एयरकंडीशंड रूमों में बैठ कर तमाम उल्टे-सीधे निर्णय ले ले....फिर आम आदमी या संगठन  सडक पर आंदोलन करता चले.....??जब सब राय आम आदमी को देनी है....और सरकार को उसके हर किये हुए कर्म का अच्छा-बूरा बतलाना है.....तो फिर ऐसे निकम्मे लोगों को सरकार बनाने का न्योता ही क्यों देना है...??
                  क्या सरकार होने का मतलब यही होता है.....कि आप मनमानी करते रहो.....मनमाने निर्णय लेकर अपने ही नागरिकों की जान सांसत में डालते रहो....उनका जीवन जीना हराम करते रहो.....??अपनी ऊंची अट्टालिकायें खडी करते रहो.....सब तरह का नाजायज काम उन्हीं नियमों के छेदों की आड में करते रहो...जिसकी बिना पर तुम किसी दूसरे को जेल में झोंक देते हो....???और मीडिया-कोर्ट और सभी तरह के संगठन सरकार के पीछे भोंपू और लाठी लेकर दौडते फ़िरें....???समझ नहीं आता कि आखिर सरकार है तो आखिर है क्या....??सरकारें हम बनाते हैं हममे से कुछ लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर हमारे बीच सब किस्म की व्यवस्था कायम करने के लिये....वो भी अपने खर्च से हुए चुनाव से और अपने ही खर्च पर दिये जाने वाले उन हज़ारों नेताओं और तमाम सरकारी लोगों को वेतन देकर.....और सब सरकार बनाते ही सिर्फ़ "अपनी व्यवस्था " कायम करने लग जायें....तो उन्हें वापस कैसे बुलाया जाये.....और उनके लिये किस तरह की सज़ा तय हो...अब सिर्फ़ इसी एक बात पर विचार करना है हमारे समाज रूपी तंत्र को....अगर सरकारें अप्रासंगिक हो गयीं हैं...या हरामी हो गयी हैं....तो उसी की वजह से न सिर्फ़ यह कु-व्यवस्था फ़ैलती है....बल्कि नस्लवाद-आतंकवाद नाम नासूर भी यहीं से पनपता है....पल्लवित होता है....और सरकार के हरामीपने की तरह सब जगह फ़ैल जाय करता है.....जिस तरह अपराधियों का इलाज लाठी-डंडे-कोडे तथा अन्य तरह की सज़ायें तय हैं.....उसी तरह यही सजायें क्या इन लोगों के लिये नहीं तय की जा सकती....अगर माननीय न्यायालय कानूनों में छेद की वजह से उचित फ़ैसला कर पाने में अक्षम है....तो फिर जनता को ही क्यों नहीं इसका ईलाज करना चाहिये....!! मुझे उम्मीद है कि यह अनपढ-गरीब और सतायी हुई जनता एकदम ठीक फैसला लेगी.....हो सकता है कि सभ्य लोगों को उसका फैसला "जंगल का कानून सरीखा लगे..."मगर अगर सब तरफ़ जंगली लोग ही हों...और आम जनता के अधिकारों का बर्बरतापूर्वक हनन कर रहे हों तो आप किस तरह उनका इलाज सो कोल्ड सभ्य कानूनों द्वारा कर सकते हैं....!!
                      पानी सर से अत्यधिक उपर जा चुका है....जनता को अब फैसला लेना ही होगा....कि उसे क्या चाहिये.....एक अमानवीय और किसी भी प्रकार की उचित सोच से रहित सरकार......और उसकी नाक तले ऊंघ रहा हरामजादा प्रशासन......कि इन सबसे मुक्ति.....अगर दूसरे रास्ते की मन में है....तब तो आगे बिल्कुल रद्दोबदल कर डालिये......अपने बीच से एकदम नये लोग निकालिये....और उन्हें चेतावनी देकर ही संसद और विधान सभाओं में भेजिये.....और अभी......अभी के लिये यही कहुंगा कि इस वर्तमान को अभी-की-अभी उखाड फेंकिये.....और यह आप सब....हम सब....यानि कि आम जनता ही कर सकती है.....क्योंकि हरामियों को सज़ा देने में हमारा कानून.....और हमारा संविधान भी पस्त हो चुका है.....!!!

Monday, July 12, 2010

क्या हम सब एक जंगल में रहते हैं.....??




मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

   क्या हम सब एक जंगल में रहते हैं.....??
..........जंगल.....!!यह शब्द जब हमारी जीभ से उच्चारित होता है....तब हमारे जेहन में एक अव्यवस्था...एक कुतंत्र...एक किस्म की अराजकता का भाव पैदा हो जाया करता है....इसीलिए मानव-समाज में जब भी कोई इस प्रकार की स्थिति पैदा होती है तो हम अक्सर इसे तड से जंगल-तंत्र की उपमा दे डालते हैं.....मगर अगर एक बार भी हम जंगल की व्यवस्था को ठीक प्रकार से देख लें तो हम पायेंगे कि हमारी यह उपमा ना सिर्फ़ गलत है....अपितु जंगल-विरोधी भी है....!!
               क्या कभी किसी ने किसी भी जंगल में अव्यवस्था नाम की चीज़ देखी भी है...??अव्यवस्था दरअसल कहते किसे हैं?....जंगल में (प्रक्रिति) का सिस्टम क्या होता है...यही ना कि शेर हिरण को खा जाता है....??मगर कब...जब उसे भूख लगती है केवल-और-केवल तब..!!जब-तब तो नहीं ही ना...मगर यह सिस्टम तो उपरवाले द्वारा प्रदत्त सिस्टम है...जिससे जंगल ही नहीं बल्कि सारा जगत चला चला करता है...मानव-जगत के सिवा....जल-थल और नभ,सब जगह का प्राकृतिक नियम एक समान है कि एक मजबूत भूखा जानवर एक कमजोर जानवर को खा जाता है...मगर सब जगह एक बात सामान्य है...वो यह कि सब जानवरों को जब भूख लगती है....केवल और केवल तभी उसके द्वारा दूसरे को खाये जाने की ऐसी घटना घटती है....इसके अलावा बाकी सब कुछ,सब समय,सब जगह बिल्कुल सामान्य और सहज ढंग से घटता रहता है.....प्राय: सब जानवर एक-दूसरे के संग आपस में घुल-मिलकर ही रहा करते हैं...और ऐसा होना हमारी जानकारी के अनुसार जीव-जगत के प्रादुर्भाव के समय से ही सुचारू ढंग से चला आ रहा है....शायद चलता भी रहेगा.....गनीमत है कि कम-से कम जंगल या जीव-जगत में यह एक अनिवार्य किस्म की नियमबद्द्त्ता जारी ही है....वरना हम हम कभी के नियम नाम की किसी चीज़ को भूल गये होते....!!
                      आदमी के जगत में,भले ही आदमी खुद को क्या-न-क्या साबित करने में लगा रहे मगर,हर पल यह बात साबित होती है कि अनुशासन में बंधना आदमी की फ़ितरत कतई नहीं है....भले ही धरती के कुछ हिस्सों में आदमी नाम की यह जात अनुशासन नाम की चीज़ से बंधी हुई दीख पड्ती है...मगर यह अनुशासन अधिकांशत: भय-जनित प्रक्रिया है,जहां कि नियम का पालन न करने पर कठोर दंड का प्रावधान है....और मज़ा यह कि तमाम कठोर-से-कठोर दंडों के बावजूद भी आदमी नाम का यह उच्चश्रृंखल  जीव नीच-से-नीच कर्म करता पाया जाता है....बेशक फांसी भी चढ जाता है....मगर अपने कुकर्मों से तनिक भी बाज नहीं आता...और मज़ा यह कि यही आदमी हर वक्त खुद को जानवरों से बेहतर बताता है...!!
                                अगर सिर्फ़ सोच के बूते,जबकि उस सोच का अपने जीवन में किसी भी प्रकार की करनी पर कोई असर तक ना हो,एक जात विशेष को बिना किसी से पुछे अपने-आप ही बेहतर बताना एक किस्म की धृष्टता ही कही जायेगी...एक अहंकार-जनित अहमन्यता.....!!मगर आदमी को इससे क्या लेना-देना....वो श्रेष्ठ था,श्रेष्ठ  है और सदा श्रेष्ठ ही रहेगा.... किसी को कोई दिक्कत है तो हुआ करे उसकी बला से....!!मगर आदमी की तमाम करनी को जानवरों के कर्मों से तौलें तो हम यही पायेंगे कि जंगल, आदमी के समाज से सदा बेहतर था...बेहतर है....और शायद जन्म-जन्मान्तर तक बेहतर ही रहेगा क्योंकि जानवर की तलाश सिर्फ़-और-सिर्फ़ पेट की भूख है....मगर आदमी की तलाश पेट से ज्यादा अहंकार.... लालच....और उससे निर्मित स्वार्थ की है....और चुंकि आदमी सोचता भी है....सो भी वह अपने स्वार्थ से ज्यादा कभी कुछ नहीं सोचता...भले वह बातें तरह-तरह की जरूर कर ले....और अपनी लच्छेदार बोलियों से अपने स्वार्थ...अपने अहंकार....अपने लालच...अपनी बेईमानियों को तरह-तरह के प्यारे-प्यारे नाम और काल्पनिक शक्ल क्युं ना दे दे....!!
                        आदमी इस जगत वह सबसे अलबेला जीव है....जो अपने समुचे जीवन में अपनी तमाम कथनी और करनी के अंतर के बावजूद खुद को खुद ही श्रेष्ठ साबित किये हुए रहता है....और मज़ा यह कि इसमें उसका खुद का ही,यानि अपनी खुद की जाति के लोगों का समर्थन भी रहता है....अपने स्वार्थ...अपने अहंकार....अपने लालच...अपनी बेईमानियों के एवज में वो कत्ल करता है.....बम फ़ोडता है....हज़ारों लोगों का एक साथ कत्लेआम करता है....अपने जीवन में खुद को और खुद के संबंधियों को आगे बढाने के लिये ना जाने क्या-क्या करम करता है....खुद के रंग....धर्म....नस्ल....धन....वर्ग को ऊंचा साबित करने से ज्यादा सामने वाले को बौना साबित करने के लिये हर-प्रकार के शाम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेता है... चुगलखोट्टा तो यह जीव इतना है कि धरती का हर जीव इसके सम्मुख तुच्छ है....और अहंकारी इतना कि ऊपरवाला भी इसके सामने पानी भरे....लालची भी इतना कि दुनिया का सब कुछ उदरस्थ करके भी इसका जी भरने को ना आये....और मज़ा यह कि फ़िर भी आदमी सबसे श्रेष्ठ है...क्या आपको हंसी नहीं आती आदमी की यानि अपनी इस स्वनामधन्य अहंकार-जनित श्रेष्ठता पर....यदि नहीं....तो आप भी इसी प्रकार की आदमीयत का इक हिस्सा हैं.....
                                आदमी हमेशा समाज-समाज करता रहता है....मगर उसके समाज की अंतरंग सच्चाई क्या है....??
               क्या यह समाज,जो एक ही जाति के लोगों का तथाकथित पढा-लिखा,सभ्य-ससंस्कृत समाज है,क्या वास्तव में यह है.. ??
              क्या धरती के इस हिस्से से लेकर उस हिस्से तक वह किसी भी एक रूप से एक है??
              वसुधैव-कुटुम्बकम की प्यारी-प्यारी धारणाओं के होते हुए भी क्या कभी भी किसी भी वक्त में यह धारणा या ऐसी ही कोई अन्य धारणा धरती पर विचार-भर के अलावा अन्य किसी भी रूप में फलीभूत हुई भी है??                                  
              क्या समाज आज भी तरह-तरह से एक-दूसरे का खून नहीं पीता....??वह भी सामाजिकता का चोला ओढ़कर....!!!!
             यह समाज क्या आज भी बिना किसी कारण के महज अपनी धारणा को पुख्ता बताने के वास्ते दूसरे का सिर कलम नहीं कर देता ??
             क्या यही समाज आज भी किसी गैर के या यहां तक कि अपने ही घर में अपनी बहन-बेटियों का रेप नहीं करता??
             क्या आज भी यह समाज अपने फायदे के लिये कौन-सा गंदे-से-गंदा काम नहीं करता....??
             आदमी के द्वारा किये जाने वाले अगर इन तमाम कामों की फ़ेहरिस्त तैयार करूं तो एक लंबा-सा आलेख अलग से और तैयार करना पडेगा....!!(आप कहें तो शुरू करूँ....??)
             सच तो यह है कि भाषा आदमी की....बोली आदमी की....जानवर तो बिचारे मूक प्राणी रहे हैं सदा से,इसलिए सदा से इस धरती पर बेखट्के राज करता आया है आदमी....मगर करे ना राज आदमी कौन साला उसे मना करता है....मगर अपनी करनी का दंड इस पूरी धरती को क्यूं देता है....अपने किये की गाज जानवरों-पहाडों-नदियों और तमाम तरह के वातावरण पर क्यूं डालता है....??
             और तो और आदमी पशुओं के नाम की गाली क्यूं देता है....पशु बेचारों ने आदमी के बाप का क्या बिगाडा है??यह जो सामाजिक दुर्व्यवस्था है...यह तो आदमी नाम के इस जीव की मौलिक उपज या आविष्कार है...!! इसे जंगल का नाम देकर जंगल बेचारे का नाम बदनाम क्यूं करता है...??
              खुदा ना खास्ते अगर कभी कुछ जानवरों ने आदमी की कुछ हरकतें सीख लीं ना.....तो आदमी का समाज जंगल चाहे बना हो या बना हो.....जंगल अवश्य एक वीभत्स समाज बन जायेगा आदमी की एक घटिया कार्बन-कापी....एकदम बेलगाम...उच्चश्रृंखल ...और इन बेचारों को यह मालूम भी ना पडेगा कि वो क्या-से-क्या बन गए हैं और उनका जंगल भी.....क्या-से-क्या....!!
            आदमी तो शायद अपनी सोच से संभवत: कभी बदल भी पाये.... क्यूंकि शायद कभी तो वह ठीक-ठाक तरह भी सोच ले.....मगर जानवर तो यह सोच भी नहीं सकते कि गलती से वे भी अगर आदमी की तरह हो गये तो धरती किस किस्म की हो जायेगी.....!!!

Sunday, June 6, 2010

इस कोढ़ में कितनी खाज है!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
दोस्तों,जब से झारखण्ड बना....इसे लेकर ना जाने कितने स्वप्न आँखों में जले और देखते ही देखते बुझ भी गए....लेकिन आखों के सपने ऐसे हैं कि कभी ख़त्म ही नहीं होते...और मुश्किल यह है कि कभी पूरे भी नहीं होने को आते....झारखण्ड का हर नागरिक जैसे सलीब पर चढ़ा अपनी आखिरी साँसों के खत्म होने का इंतज़ार कर रहा है...क्यूंकि हालात ऐसे हैं कि किस-किस बात पर आन्दोलन किये जाएँ...प्रशासन और मंत्रालय का कोई भी हिस्सा अपने कार्य को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं है...और मज़ा यह कि सब-के-सब "चोट्टे-सूअर-मवाली-हरामखोर-राज्य और देश-द्रोही"लोग मलाई भी मार रहे हैं और मालामाल भी हुए जा रहे हैं...और काम के नाम पर सिर्फ-और-सिर्फ माल खाने का काम हो रहा है....इस राज्य के एक-एक नागरिक का एक-एक दिन एक तरह की वितृष्णा के साथ गुजर रहा है...और मुझे संदेह है कि जाने कब यह सब किसी भी क्षण एक अनियंत्रित हिंसा में बदल जाए....और जब ऐसा होगा...तब शायद किसी दंगे की तरह नेताओं और उनके चमचों-गुर्गों को चुन-चुन कर मार डाला जाए.....ऐसा अभी से दीख पड़ रहा है.....ऐसे ही विचार वर्षों से दिलो-दिमाग में आते रहते हैं....कि अगर अब भी यह सब नहीं रुका तो न जाने कब राज्य का हरेक नागरिक ही नक्सली बन जाएगा....और.........


ये किन मक्कारों का राज है
इस कोढ़ में कितनी खाज है!!
पता नहीं क्या होना है अब
ये किस भविष्य का आज है !!
कि नेता हैं या कुत्ते-बिल्लियाँ
छील रहे हैं कितनी झिल्लियाँ !!
झारखण्ड को छला है जिन्होंने
क्या दी जाए इसकी उनको सज़ा ??
ये कौन से लोग हैं कि जिनको
मादरे-वतन की कीमत का नहीं पता....
ये कौन से लोग हैं कि जिनको
चमन की जीनत का नहीं पता....
अगर कुछ भी नहीं पता इन्हें तो फिर
किस तरह हम पर ये कर रहे हैं राज....
और क्यूँ नहीं हो रही हमें कोई भी खाज ??
उट्ठो कि ऐसे लोगों को भून दें हम आज
उट्ठो और कहो कि ऐसे लोगों का ये चमन नहीं !!
ऐसे लोगों को दोस्तों कह दो हमेशा के लिए.....
नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं-नहीं......
और अगर नहीं माने फिर भी ये अगर तो फिर
ख़त्म कर दो इन्हें अभी यहीं की यहीं....
बहुत हो गया दोस्तों कि अब तो खड़े हो जाओ
बच्चों की तरह मत जीओ,अब बड़े भी हो जाओ !!
जिनके लिए बनाया गया है यह झारखण्ड
उन्हीं को किये जा रहे हैं सब खंड-खंड
रण ही अगर लड़ना है तो कमर कस लो सब-के-सब
ये नहीं मानेंगे साले बातों से कुछ भी नहीं अब
तुम्हें मेरे दोस्तों दरअसल कुछ करना नहीं है अब
बस अबके पहचान लो इन सब "कुत्तों"को.....
बस अबके चुनाव में जमा-जमाकर कसकर....
कई लात मार देना इन सभी के चूतडों पर....
कि फिर कभी दिखाई ना दें ये गलती से भी
झारखंड के किसी भी किस्म के परिदृश्य पर....
ये किन कमीनों को पहना दिया हमने गलती से ताज है
अब किस मुहं से कहोगे कि तुम्हें झारखंड पर नाज है !!
दोस्तों ये कविता नहीं है ये तुम्हारे भड़कने का आगाज है
अभी सब कुछ मर नहीं गया है...
अभी तुम्हारे सामने बहुत बड़ी परवाज़ है.... !!!