............दोस्तों एक कलमकार का अपनी कलम छोड़ कर किसी भी तरह का दूसरा हथियार थामना बस इस बात का परिचायक है कि अब पीडा बहुत गहराती जा रही है और उसे मिटाने के तमाम उपाय ख़त्म....हम करें तो क्या करें...हम लिख रहें हैं....लिखते ही जा रहे हैं....और उससे कुछ बदलता हुआ सा नहीं दिखाई पड़ता....और तब भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता तो हमारी संवेदना में अवश्य ही कहीं कोई कमी है... मगर जिसे वाकई दर्द हो रहा है....और कलम वाकई कुछ नहीं कर पा रही....तो उसे धिक्कारना तो और भी बड़ा पाप है....दोस्तों जिसके गम में हम शरीक नहीं हो सकते....और जिसके गम को हम समझना भी नहीं चाहते तो हमारी समझ पर मुझे वाकई हैरानी हो रही है....जूता तो क्या कोई बन्दूक भी उठा सकता है.....बस कलेजे में दम हो.....हमारे-आपके कलेजे में तो वो है नहीं....जिसके कलेजे में है.....उसे लताड़ना कहीं हमारी हीन भावना ही तो नहीं...........??????
.............दोस्तों हमारे आस-पास रोज-ब-रोज ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं और होती ही जा रही हैं,
जिन्हें नज़रंदाज़ कर बार-बार हम अपने ही पैरों में कुल्हाडी मारते जा रहे हैं....और यह सब वो लोग अंजाम दे रहे हैं, जिन्हें अपने लिए हम अपना नुमाइंदा "नियुक्त" करते हैं....!!यह नुमाइंदा हमारे द्वारा नियुक्त होते ही सबसे पहला जो काम करता है,वो काम है हमारी अवहेलना....हमारा अपमान....हमारा शोषण....और हमारे प्रत्येक हित की उपेक्षा.....!!.........दोस्तों यहाँ तक भी हो तो ठीक है.....लेकिन यह वर्ग आज इतना धन-पिपासू....यौन-पिपासू.... जमीन-जायदाद-पिपासू.....इतना अहंकारी और गलीच हो चुका है कि अपने इन तीन सूत्री कार्यक्रम के लिए हर मिनट ये देश के साथ द्रोह तक कर डालता है....देश के हितों का सौदा कर डालता है....यह स्थिति दरअसल इतने खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है कि इस वर्ग को अब किसी का भय ही नहीं रह गया है....पैसे और ताकत के मद में चूर यह वर्ग अब अपने आगे देश को भी बौना बनाए रखता है.....निजी क्षेत्र के किए गए कार्यों की भी यह ऐसी की तैसी किए दे रहा है.....निजी क्षेत्र ने इस देश की तरक्की में जो अमूल्य योगदान सिर्फ़ अपनी मेहनत-हुनर और अनुशासन के बूते दिया है.....यह स्वयम्भू वर्ग उसके श्रेय को भी ख़ुद ही बटोर लेना चाहता है....और यहाँ तक कि यह वर्ग अपने पद और रसूख के बूते उनका भी शोसन कर लेता है.....यानी कि इसकी दोहरी मार से कोई भी बचा हुआ नहीं है......!!
यह स्थिति वर्षों से जारी है...और ना सिर्फ़ जारी है....बल्कि आज तो यह घाव एक बहुत बड़ा नासूर बन चुका है...अब इसे अनदेखा करना हमारे और आप सबके लिए इतनी घातक है कि इसकी कल्पना तक आप नहीं कर सकते........आन्दोलन तो खैर आने वाले समय में होगा ही किंतु इस समय इस लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है.....इस महापर्व का अवसान फिजूल में ही ना हो जाए....या कि यह एक प्रहसन ही ना बन जाए.....इसके लिए सबसे पहले हम जैसे पढ़े-लिखे लोगों को ही पहल करनी होगी.....क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभ्य-सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे माने जाने वाले सो कॉल्ड बड़े लोगों में अधिकाँश लोग अपने मत का प्रयोग तक नहीं करते....लम्बी लाईनों में लगना....धूप में सिकना....गंदे-संदे लोगों के साथ-साथ खड़े होना......घर की महिलाओं को इस गन्दी भीड़ का हिस्सा होते हुए ना देख पाना.....या किसी काल्पनिक हिंसा की आड़ लेकर चुनाव से बचना हमारा शगल है....!! मज़ा यह कि हम ही सबसे वाचाल वर्ग भी हैं.....जो समाज में सबसे ज्यादा हल्ला तरह-तरह के मंचों से मचाते रहते हैं.....कम-से-कम अपने एक मत (वोट)का प्रयोग कर ख़ुद को इस निंदा-पुराण का वाजिब हक़ दिला सकते हैं....वरना तो हमें राजनीति की आलोचना करने का भी कोई हक़ नहीं हैं......अगर वाकई मेरी बात सब लोगों तक पहुँच रही हो....तो इस अनाम से नागरिक की देश के समस्त लोगों से अपील है.....बल्कि प्रार्थना हैं कि इस चुनाव का वाजिब हिस्सा बनकर.....और कर्मठ लोगों को जीता कर हमारी संसद और विधान-सभाओं में पहुंचाएं.....और आगे से हम यह भी तय करें कि यह उम्मीदवार जीतने के पश्चात हमारे ही क्लच में रहे.....हमारे ही एक्सीलेटर बढ़ाने से चले.......!!
................दोस्तों बहुत हो चुका....बल्कि बहुत ज्यादा ही हो चुका......अब भी अगर यही होता दीखता है तो फिर तमाम लोग सड़क पर आने को तैयार हो जाए.....अब तमाम "गंदे-संदे.....मवालियों....देश के हितों का सौदा करने वालों.....जनता की अवहेलना करने वालों.....और इस तरह की तमाम हरकतें करने वालों को आमने-सामने मैदान में ही देख लिया जाए.....!!
.........तो फिर यह तय रहा कि चल रहे चुनाव में आप अपनी भागेदारी निश्चित करेंगे....संसद और विधान-सभाओं को अपराधियों और देश-द्रोहियों से मुक्त करायेंगे......फिर भी कोई अपराधी इन जगहों पर पहुँच ही जाते हैं.....तो इनका वाजिब इलाज भी करायेंगे.....यह निश्चित करें कि हम सब देश के हक़ लिए काम करें......तथा ऐसा ना करने वालों को सार्वजनिक दंड भी दें.........इसी आशा और मंगलकामना के साथ.....आपका भूतनाथ....एक अनजान नागरिक.....एक अनाम आवाज़.......!!......लेकिन ऐसी जो आपकी ही लगे.......!!!......सच.....!!!!
Friday, April 17, 2009
Thursday, April 16, 2009
अब नहीं रहा वो सद्दाम का इराक !

पश्चिमी मिडिया में लगातार छपी खोजी रपटों से मार्डेन हिस्ट्री की जघन्यतम हत्या की सच्चाई छन छन कर सुर्खियों में आई थी | जार्ज वाकर बुश, जो अब राष्ट्रपति नहीं रहे, ने विश्व बिरादरी से झूठ बोला था कि इराक के दिवंगत राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन (जिन्हें शहीद कर दिया गया था) नरसंहार के भयावह शस्त्रों के उत्पादन में जुटे थे | अमेरिका के वर्तमान रष्ट्रपति बराक़ हुसैन ओबामा ने चुनाव के समय यह कहा था कि उनके प्रतिद्वंदी जान मैक्कन की रिपब्लिकन पार्टी झूठ के पहाड़ पर खड़ी हुई है और अमेरिका की जनता ही इसका जवाब देगी | हुआ भी यही चुनाव के बाद की तस्वीर साफ़ है, अब वहां बुश की पार्टी हाशिये पर आ गयी और इसी के चलते बुश से पहले ब्रितानिया हुकुमत टोनी ब्लेयर के हाथो से निकल गयी और टोनी ब्लेयर को इराक पर गुमराह करने करने के कारण ही ब्रिटेन के प्रधानमत्री का पद छोड़ना पड़ा | उधर अमेरिका में मुस्लिम से ईसाई बने बराक हुसैन ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने लेकिन विश्व बिरादरी को ज्यादा खुश होने की ज़रुरत नहीं है कि बराक ओबामा के अमेरिका का राष्ट्रपति बन गए हैं|
बुश का जो हाल हुआ वो तो होना ही था, इराकी पत्रकार ने जूता मारकर उनकी औकात बता दी | इतिहास के कठघरे में बुश अभियुक्त बन कर पेश होंगे, जब इराक पर अमेरिकी नरसंहार की खबर और ज्यादा पेश होंगी और तब से वर्तमान तक हजारों बेगुनाहों की जानों का ठीकरा बुश के सर फूटेगा, मैं तो इसे दुनिया की सबसे बड़ी आतंकी हमला कहूँगा, जो अमेरिका ने इराक पर किया| बुश क्या इससे पहले भी जैसा कि सबको पता है वियतनाम पर रिचर्ड निक्सन की बमबारी के वर्षों बाद उजागर हुई थी | आज सद्दाम हुसैन को राष्ट्रवादी शहीद का दर्जा और खिताब मिल चुका है | उनकी हत्या का प्रतिरोध और प्रतिकार इराक में रोज़ हो रहा है, अमेरिकी सैनिकों (आतंकी घुसपैठिये) और उनके अरब दलाल की बम विस्फोटों में मौतें इसके सबूत हैं| मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ क्या इराक पर अमेरिकी आतंकी हमले से पूर्व वहां इतनी ही अशांति थी, अवश्य आपका जवाब नहीं होगा और आप यह ज़रूर कहेंगे कि पहले वह बहुत खुशनुमा माहौल था |
उन्नीस साल पहले सीनियर जार्ज बुश ने सद्दाम हुसैन पर पहले बमबारी की थी| प्रतिकार में सदाम हुसैन ने पुत्र और इराकी पत्रकार उनियां के प्रेसिडेंट उदय हुसैन ने इराक के होटलों के प्रवेश द्वार पर बिछे पायदान में बुश की आकृति बुनवा कर लगा दी | महाबली के अपमान का यह नायाब तरीका था | पितृऋण चुकाने का इसके बाद जूनियर बुश ने बिल क्लिंटन के बाद राष्ट्रपति निर्वाचित होते ही बदला लेने के लिए मौके तलाशे और इराक पर बमबारी कर दी | बहाना था इराक में नरसंहार के आयुधों का उत्पादन जो आजतक साबित नहीं हो सका |
सदाम हुसैन का अवसान भारत के लिए राष्ट्रिय त्रासदी थी क्यूंकि वह इस्लामी राष्ट्रनायकों में एक वाहिद सेकुलर व्यक्ति था | केवल चरमपंथी लोग ही उसकी मौत की पीड़ा से अछूते रहे | कारण ? दर्द की अनुभूति के लिए मर्म होना चाहिए | इराकी समाजवादी गणराज्य के दिवंगत राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अल तिकरिती पर चले अभियोग और फिर सुनाये गए फैसले को महज राजनैतिक प्रहसन कहा जायेगा|
भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों को याद दिलाना चाहता हूँ कि सदाम हुसैन अकेले मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग माना और ऐलानिया कहा भी | अयोध्या कांड पर बाबरी मस्जिद शहीद हुई थी तो इस्लामी दुनिया में बवंडर मचा था तो उस वक़्त बगदाद शांत था| बकौल सद्दाम हुसैन "वह एक पुराणी ईमारत गिरी है, यह भारत का अपना मामला है| उन्हीं दिनों ढाका में प्राचीन ढाकेश्वरी मंदिर ढहाया गया| तसलीमा नसरीन ने अपनी कृति (लज्जा) में हिन्दू तरुणियों पर हुए वीभत्स ज़ुल्मों का वर्णन किया| इसी पूर्वी पकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा मुक्त करने पर शेख मुजीब के बांग्लादेश को मान्यता देने में सद्दाम सर्वप्रथम थे|

इंदिरा गाँधी की (1975) इराक यात्रा पर मेजबान सद्दाम हुसैन ने उनका सूटकेस उठाया था | जब राएबरेली लोकसभा चुनाव में वे हार गयीं तो इंदिरा गाँधी को बगदाद में स्थाई आवास की पेशकश सद्दाम ने की थी | पोखरण द्वितीय पर अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार को सद्दाम ने बधाई दी थी, जबकि कई राष्ट्रों ने आर्थिक प्रतिबन्ध लादे थे| सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के राष्ट्री अधिवेशनों में शिरकत करते रहे| भारत के राजनेताओं को ज़रूर याद होगा कि भारतीय रेल के लाखों कर्मचारियों को आकर्षक अवसर सद्दाम ने वर्षों तक उपलब्ध कराए|
उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम में तो इराक से मिले ठेकों से खूब पैसा कमाया| 35 लाख भारतीय श्रमजीवी सालाना एक ख़राब रुपये भारत भेजते थे | भारत को इराकी तेल सस्ते दामों पर उपलब्ध होता था | इस सुविधा का भी खूब दुरूपयोग तत्कालीन रूलिंग पार्टी के नेताओं ने किया था| इराक के तेल पर कई भारतीयों ने बेशर्मी से चाँदी काटी|
एक दैनिक हिंदी अखबार में एक संपादक श्री के. विक्रम राव ने अपनी इराक यात्रा की वर्णन में यह कहा था कि उसे इराक में के शहरों में तो बुरका नज़र ही नहीं आया था | उन शहरों में कर्बला, मौसुल, तिकरिती आदि सुदूर इलाके थे| स्कर्ट और ब्लाउज राजधानी बगदाद में आम लिबास था, माथे पर वे बिंदिया लगतीं थी और उसे हिंदिया कहती थीं| लेकिन पूरी तरह से पश्चिम का गुलाम हो चुका हमारा मिडिया तो वहां की ऐसी तस्वीर दिखाता कि पूछो मत |
अब की तस्वीर पर अज़र डालेंगे तो मिलेगा की सद्दाम के समय में हुई तरक्की में अब गिरावट आ गयी है बल्कि वह पतन पर है| टिगरिस नदी के तट पर या बगदाद की शादकों पर राहजनी अब आम बात हो गयी है | एक दीनार जो साथ रुपये के विनिमय दर पर था आज रुपये में बीस मिल जायेंगे और अब तो विदेशी विनिमय के दफ्तर यह कहते हैं कि आर बी आई के अनुसार इराकी मुद्रा विनिमय योग्य नहीं है | दुपहियों और तिपहियों को पेट्रोल मुफ्त मिलता था, शर्त यह थी कि ड्राईवर या गाड़ी मालिक उसे स्वयं भरे | और भारत में बोतल भर एक लीटर पानी दस रुपये का है| सद्दाम के इराक में उसके छते अंश पर लीटर भर पेट्रोल मिलता था | अमेरिका द्वारा थोपे गए कथित लोकतान्त्रिक संविधान के तहत इराक के सेकुलर निजाम की जगह अब अमेरिका के दलालों ने ले ली है, जिनमे कठमुल्ले भी हैं|
लेकिन भाजपाई जो मोहमद अली जिन्ना को सेकुलर के खिताब से नवाजते हैं, सद्दाम हुसैन को सेकुलर नहीं मानेंगे | उसका कारण भी है सद्दाम हुसैन पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ते थे, वहां नमाज़ के वक़्त दुकाने और प्रतिष्ठान बंद हो जाते थे | सद्दाम हुसैन अपने साथ हर वक़्त कुरान की एक प्रति अपने साथ रखते थे| पैगम्बर मोहम्मद (इश्वर की उन पर शांति हो) के साथ साथ ईसा मसीह को भी इसलाम के पैगम्बर में से एक मानते थे| इसका उन्होंने खामियाजा भुगता | अमेरिकी पूंजीवादी दबाव में साउदी अरब के शाह नेशलिस्ट इराक को नेस्तनबुत करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी | साउदी अरब में प्यारे नबी मोहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) के जन्मस्थली के निकट अमेरिकी सेना (हमलावर, आतंकवादी) को जगह दी और जन्मस्थली के ऊपर से जहाज़ उड़ कर प्यारे नबी के नवासे के कुरबानगाह पर बम बरसाए |
सद्दाम के डर के मारे अरबी शासकों के लिए यह भी था कि इराकी सेना ने कुवैत पर कब्जा किया है (कुवैत इराक का अभिन्न अंग था) और वह मज़हबी सुधार लाया था | पिछली सदी के चौथे दशक तक कुवैत इराक का अभिन्न अंग था| सद्दाम को दण्डित करने के कारणों की यूरोप अमेरिकी राष्ट्रों ने लम्बी लिस्ट बनाई मगर मुकदमा चलाया पच्चीस साल पुराना घटना के आधार पर | अपराध मडा दुजाईल प्रान्त में 148 शिया विद्रोहियों की (1982 में) हत्या करवाने का |
मगर इतिहास करवट लेता है | सद्दाम हुसैन भी अब इमरे नाष की भांति इराकी देशभक्त और इस्लामी राष्ट्रवाद के प्रतिक बन रहे हैं, जैसे मिस्र के जमाल अब्दुल और तुर्क के मुस्तफा कमाल पाशा अतातुर्क हैं|
Monday, April 13, 2009
औरों की तरह मैं भी हलकान रहा.....!!
पता नहीं क्यूँ उसके वादे पर करार रहा
वो झूठा था पर उसपे मुझे ऐतबार रहा !!
दिन-भर मेहनत ने मुझे दम ना लेने दिया
और फिर रात भर दर्द मुझसे बेहाल रहा !!
अजीब यह कि जो खेलता था,अमीर था
और जो मेहनत-कश था,वो बदहाल रहा !!
सच मुहँ छुपाये कचहरी में खडा रहता था
झूठ अन्दर-बाहर सब जगह वाचाल रहा !!
कई बार सोचा कि मैं ही अपना मुहं खोलूं
और लोगों की तरह मैं भी हलकान रहा !!
वो झूठा था पर उसपे मुझे ऐतबार रहा !!
दिन-भर मेहनत ने मुझे दम ना लेने दिया
और फिर रात भर दर्द मुझसे बेहाल रहा !!
अजीब यह कि जो खेलता था,अमीर था
और जो मेहनत-कश था,वो बदहाल रहा !!
सच मुहँ छुपाये कचहरी में खडा रहता था
झूठ अन्दर-बाहर सब जगह वाचाल रहा !!
कई बार सोचा कि मैं ही अपना मुहं खोलूं
और लोगों की तरह मैं भी हलकान रहा !!
Sunday, April 12, 2009
अब कौन लिखेगा आवारा मसीहा जैसी जीवनी
साहित्यकार विष्णु प्रभाकर को श्रद्धांजलि
रवींद्र व्यास
इस उत्तर आधुनिक समय में जब हर कोई जल्द से जल्द प्रसिद्ध और लोकप्रिय होना चाहता है, प्रचार-प्रसार की दुनिया से हर कोई प्रभावित होकर दूधिया रोशनी में आने के लिए लालायित रहता हो तब किसी भी लेखक का लगातार लिखते रहना और चुपचाप लिखते रहना एक भरोसा पैदा करता है कि अभी भी कुछ ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने समय को समझते-बूझते उसे रच रहे हैं। बिना इसकी चिंता किए कि उन्हें कितना पढ़ा जाएगा और उन्हें कितना समझा जाएगा। और यह भी कि उन्हें कितनी ख्याति मिलेगी। लगता है विष्णु प्रभाकर इस परंपरा के आखिरी साहित्यकार थे जो किसी भी तरह की चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना चुपचाप लिखते रहे। उनके निधन से उस परंपरा का आखिरी स्तंभ भी ढह गया है। उन्हें जो ख्याति आवारा मसीहा से मिली, वैसी उनकी किसी दूसरी कृति से उन्हें नहीं मिली। हालाँकि उन्होंने अर्धनारीश्वर जैसी कृति भी लिखी जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आवारा मसीहा बांग्ला के ख्यात उपन्यासकार शरत बाबू की जीवनी है। अंग्रेजी में जीवनी लिखने की एक लंबी परंपरा है और वहाँ आपको अभिनेता से लेकर निर्देशक, संगीतकार से लेकर नर्तक और लेखक से लेकर गायक तक की कई बेहतरीन जीवनियाँ मिल जाएँगी लेकिन हिंदी में जीवनी लेखन परिदृश्य लगभग उजाड़-सा है। इसमे आवारा मसीहा एक बेजोड़ जीवनी है। इस उपन्यास को हिंदी में जो प्रेम मिला वैसा बहुत ही कम कृतियों को नसीब होता है। इससे यह निष्कर्ष निकालने में आसानी हो सकती है कि विष्णु प्रभाकर को पाठकों का गहरा प्रेम हासिल हुआ। और यही कारण है कि हिंदी में इसे जो लोकप्रियता हासिल हुई उसी कारण इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और ऐसा माना जाता है कि इन भाषाओं में भी आवारा मसीहा को खुले दिल से सराहा गया। गाँधीवादी विचारों से प्रभावित रहे विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई यह जीवनी एक तरफ जहाँ दिग्गज उपन्यासकार शरत बाबू के जीवन और समय को समझने की एक संवेदनशील और गहरी नजर देती है वहीं यह भी दर्शाती है कि एक लेखक दूसरे लेखक को कितनी सहानुभूति और सहृदयता से देखने-समझने की कोशिश करता है। आवारा मसीहा न केवल एक लेखक के बनने, अपने समय में रहते हुए उससे प्रतिकृत होने और रचने के लिए एक अनिवार्य यातना को एक सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है बल्कि इसे पढ़ते हुए हम यह सहज ही अंदाज भी लगा सकते हैं कि इसके लिए प्रभाकरजी ने कितना श्रमसाध्य शोध और अध्ययन किया। उन्होंने लगभग आवारा मसीहा लिखने से पहले लगभग 15-16 सालों तक अध्ययन किया।उन लोगों से मिले जो शरत बाबू के संपर्क में थे, उनके तमाम पत्रों, साहित्य, करतनों का अध्ययन किया। वे उन जगहों पर गए जहाँ शरत बाबू रहते थे और जहाँ उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हि्स्सा बिताया। हम शरत बाबू को एक रचनाकार के रूप श्रीकांत, चरित्रहीन और देवदास जैसे उपन्यासों के कारण जानते हैं। और इसलिए भी जानते हैं कि उनके उपन्यासों पर श्रीकांत पर सीरियल और देवदास पर फिल्में बन चुकी हैं। हाल ही फिल्मकार शक्ति सामंत ने उनके एक उपन्यास से प्रेरित होकर ही अमर प्रेम जैसी फिल्म बनाई थी लेकिन आवारा मसीहा के जरिये एक व्यक्ति के रूप में शरत बाबू से परिचित होते हैं। यह किताब इतने धैर्य, इतने निर्मल मन और साफ दृष्टि से रची गई है कि हम शरत बाबू की बाहरी दुनिया से ज्यादा उनकी भीतरी दुनिया से ज्यादा आत्मीय तरीके से परिचित हो पाते हैं। तमाम खूबियों के साथ-साथ शरत बाबू कमजोरियों लिए हमारे सामने आते हैं। उनका अभावग्रस्त जीवन, बीच में पढ़ाई छोड़ देना, प्रेम और शराब की लत से लगातार सेहत गिरना, उनके जीवन के तमाम महत्वपूर्ण मोड़ों से गुजरते हम उन्हें महसूस कर सकते हैं। आवारा मसीहा विष्णु प्रभाकर की एक कृति नहीं एक दूसरे लेखक के अंतरमन में गहरे उतरकर रचने की चुनौती है। यह उनके अँधेरे-उजाले में सिर झुकाकर उन्हें समझने की कोशिश है और एक लेखक के प्रति दूसरे लेखक का अगाध प्रेम भी है। मुझे नहीं लगता कि किसी लेखक की ऐसी जीवनी लिखने का धैर्य अब किसी लेखक में होगा। हालाँकि आवारा मसीहा मुझे जीवनी और औपन्यासिक कृति के बीच की कोई खूबसूरत कृति लगती है क्योंकि इसमें तथ्यों के साथ विष्णुजी ने अपनी कल्पना और कहानी कहने की कला का सहारा भी लिया है। शायद यही कारण है कि यह एक अमूल्य कृति का दर्जा पा सकी है।
रवींद्र व्यास
इस उत्तर आधुनिक समय में जब हर कोई जल्द से जल्द प्रसिद्ध और लोकप्रिय होना चाहता है, प्रचार-प्रसार की दुनिया से हर कोई प्रभावित होकर दूधिया रोशनी में आने के लिए लालायित रहता हो तब किसी भी लेखक का लगातार लिखते रहना और चुपचाप लिखते रहना एक भरोसा पैदा करता है कि अभी भी कुछ ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने समय को समझते-बूझते उसे रच रहे हैं। बिना इसकी चिंता किए कि उन्हें कितना पढ़ा जाएगा और उन्हें कितना समझा जाएगा। और यह भी कि उन्हें कितनी ख्याति मिलेगी। लगता है विष्णु प्रभाकर इस परंपरा के आखिरी साहित्यकार थे जो किसी भी तरह की चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना चुपचाप लिखते रहे। उनके निधन से उस परंपरा का आखिरी स्तंभ भी ढह गया है। उन्हें जो ख्याति आवारा मसीहा से मिली, वैसी उनकी किसी दूसरी कृति से उन्हें नहीं मिली। हालाँकि उन्होंने अर्धनारीश्वर जैसी कृति भी लिखी जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आवारा मसीहा बांग्ला के ख्यात उपन्यासकार शरत बाबू की जीवनी है। अंग्रेजी में जीवनी लिखने की एक लंबी परंपरा है और वहाँ आपको अभिनेता से लेकर निर्देशक, संगीतकार से लेकर नर्तक और लेखक से लेकर गायक तक की कई बेहतरीन जीवनियाँ मिल जाएँगी लेकिन हिंदी में जीवनी लेखन परिदृश्य लगभग उजाड़-सा है। इसमे आवारा मसीहा एक बेजोड़ जीवनी है। इस उपन्यास को हिंदी में जो प्रेम मिला वैसा बहुत ही कम कृतियों को नसीब होता है। इससे यह निष्कर्ष निकालने में आसानी हो सकती है कि विष्णु प्रभाकर को पाठकों का गहरा प्रेम हासिल हुआ। और यही कारण है कि हिंदी में इसे जो लोकप्रियता हासिल हुई उसी कारण इसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और ऐसा माना जाता है कि इन भाषाओं में भी आवारा मसीहा को खुले दिल से सराहा गया। गाँधीवादी विचारों से प्रभावित रहे विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई यह जीवनी एक तरफ जहाँ दिग्गज उपन्यासकार शरत बाबू के जीवन और समय को समझने की एक संवेदनशील और गहरी नजर देती है वहीं यह भी दर्शाती है कि एक लेखक दूसरे लेखक को कितनी सहानुभूति और सहृदयता से देखने-समझने की कोशिश करता है। आवारा मसीहा न केवल एक लेखक के बनने, अपने समय में रहते हुए उससे प्रतिकृत होने और रचने के लिए एक अनिवार्य यातना को एक सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है बल्कि इसे पढ़ते हुए हम यह सहज ही अंदाज भी लगा सकते हैं कि इसके लिए प्रभाकरजी ने कितना श्रमसाध्य शोध और अध्ययन किया। उन्होंने लगभग आवारा मसीहा लिखने से पहले लगभग 15-16 सालों तक अध्ययन किया।उन लोगों से मिले जो शरत बाबू के संपर्क में थे, उनके तमाम पत्रों, साहित्य, करतनों का अध्ययन किया। वे उन जगहों पर गए जहाँ शरत बाबू रहते थे और जहाँ उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण हि्स्सा बिताया। हम शरत बाबू को एक रचनाकार के रूप श्रीकांत, चरित्रहीन और देवदास जैसे उपन्यासों के कारण जानते हैं। और इसलिए भी जानते हैं कि उनके उपन्यासों पर श्रीकांत पर सीरियल और देवदास पर फिल्में बन चुकी हैं। हाल ही फिल्मकार शक्ति सामंत ने उनके एक उपन्यास से प्रेरित होकर ही अमर प्रेम जैसी फिल्म बनाई थी लेकिन आवारा मसीहा के जरिये एक व्यक्ति के रूप में शरत बाबू से परिचित होते हैं। यह किताब इतने धैर्य, इतने निर्मल मन और साफ दृष्टि से रची गई है कि हम शरत बाबू की बाहरी दुनिया से ज्यादा उनकी भीतरी दुनिया से ज्यादा आत्मीय तरीके से परिचित हो पाते हैं। तमाम खूबियों के साथ-साथ शरत बाबू कमजोरियों लिए हमारे सामने आते हैं। उनका अभावग्रस्त जीवन, बीच में पढ़ाई छोड़ देना, प्रेम और शराब की लत से लगातार सेहत गिरना, उनके जीवन के तमाम महत्वपूर्ण मोड़ों से गुजरते हम उन्हें महसूस कर सकते हैं। आवारा मसीहा विष्णु प्रभाकर की एक कृति नहीं एक दूसरे लेखक के अंतरमन में गहरे उतरकर रचने की चुनौती है। यह उनके अँधेरे-उजाले में सिर झुकाकर उन्हें समझने की कोशिश है और एक लेखक के प्रति दूसरे लेखक का अगाध प्रेम भी है। मुझे नहीं लगता कि किसी लेखक की ऐसी जीवनी लिखने का धैर्य अब किसी लेखक में होगा। हालाँकि आवारा मसीहा मुझे जीवनी और औपन्यासिक कृति के बीच की कोई खूबसूरत कृति लगती है क्योंकि इसमें तथ्यों के साथ विष्णुजी ने अपनी कल्पना और कहानी कहने की कला का सहारा भी लिया है। शायद यही कारण है कि यह एक अमूल्य कृति का दर्जा पा सकी है।
Saturday, April 11, 2009
ये कैसी जिन्दगी मुझे जीनी पड़ गई.......!!
जुर्म किए थे इतने,चदरिया झीनी पड़ गई
उम्र भी कमबख्त आख़िर दीन्ही पड़ गई !!
था शुक्र मुझपे इतना कि खुशियों का हाय
कुछ ख़ुशी कम करने को पीनी पड़ गयी !!
पता नहीं क्यूँ ऊपर वाले ने भेजा मुझे यहाँ
जिन्दगी जीने की खातिर जीनी पड़ गयी !!
लानत है मुझपे कि वक्ते-हयात पिया न गया
जन्नत में खुदा के साथ को पीनी पड़ गयी !!
मैं अपने साथ लाया था कुछ सुख की शराब
ना चाहते हुए भी आदम को पीनी पड़ गयी !!
मैं अपनी कब्र पे बैठा सोचा किया "गाफिल"
ये कैसी जिन्दगी थी जो मुझे जीनी पड़ गयी !!
उम्र भी कमबख्त आख़िर दीन्ही पड़ गई !!
था शुक्र मुझपे इतना कि खुशियों का हाय
कुछ ख़ुशी कम करने को पीनी पड़ गयी !!
पता नहीं क्यूँ ऊपर वाले ने भेजा मुझे यहाँ
जिन्दगी जीने की खातिर जीनी पड़ गयी !!
लानत है मुझपे कि वक्ते-हयात पिया न गया
जन्नत में खुदा के साथ को पीनी पड़ गयी !!
मैं अपने साथ लाया था कुछ सुख की शराब
ना चाहते हुए भी आदम को पीनी पड़ गयी !!
मैं अपनी कब्र पे बैठा सोचा किया "गाफिल"
ये कैसी जिन्दगी थी जो मुझे जीनी पड़ गयी !!
Thursday, April 9, 2009
लम्हों ने कुछ खता की है.....!!
लम्हे
वक्त की धरती पर
लम्हों के निशाँ
कभी नहीं बनते !!
लम्हे तो वैसे ही होते हैं
जैसे समंदर की छाती पर
अलबेली-अलमस्त लहरें
शोर तो बहुत करती आती हैं
मगर अगले ही पल
सब कुछ ख़त्म !!
आदमी
आदमी बोलता बहुत है
सच बताऊँ !!
आदमी अपनी बोली में
झगड़ता बहुत है !!
सुख
सुख पेड़ की मीठी छावं है
मगर मिलती है वह
धरती के बहुत गहरे से
जड़-तना-डाली-पत्ते बनकर
बहुत बरसों बाद !!
चूहा
आदमी !!
एक बहुत बड़ा चूहा है
जो खाता रहता है
दिन और रात
धरती को कुतर-कुतर
रेपिस्ट
आदमी !!
एक बहुत बड़ा रेपिस्ट है
जो करता है
हर इक पल
धरती का स्वत्व-हरण
और देता है उसे
अपना गन्दा और
दुर्गंधमय अवशिष्ट-अपशिष्ट !!
.............!!
आदमी के अवशिष्ट से
कुम्भला और पथरा गई है धरती
और आदमी सोचता है
कि वही महान है !!
................!!
आदमी !!....सचमुच......
है तो बड़ा ही महान
और उसकी महानता
बिखरी पड़ी है
धरती के चप्पे-चप्पे पर.....!!
और बढती ही चली जा रही है
ये महानता...पल-दर-पल....
और बिचारी धरती....
सिकुड़ती ही चली जा रही है
इस महानता के बर-अक्श ....!!
और मजा यह कि
आदमी कभी अपने-आपको
रेपिस्ट समझता ही नहीं.....!!
वक्त
वक्त.....
इक छोटा-सा मगर
बड़ा ही शैतान-सा बच्चा है !!
जो हर समय
क्षणों की डाली से
लम्हों के फल
तोड़ता रहता है
कभी थकता ही नहीं !!
अपने आगे वक्त
अक्सर ख़ुद ही
छोटा पड़ जाता है !!
वक्त की धरती पर
लम्हों के निशाँ
कभी नहीं बनते !!
लम्हे तो वैसे ही होते हैं
जैसे समंदर की छाती पर
अलबेली-अलमस्त लहरें
शोर तो बहुत करती आती हैं
मगर अगले ही पल
सब कुछ ख़त्म !!
आदमी
आदमी बोलता बहुत है
सच बताऊँ !!
आदमी अपनी बोली में
झगड़ता बहुत है !!
सुख
सुख पेड़ की मीठी छावं है
मगर मिलती है वह
धरती के बहुत गहरे से
जड़-तना-डाली-पत्ते बनकर
बहुत बरसों बाद !!
चूहा
आदमी !!
एक बहुत बड़ा चूहा है
जो खाता रहता है
दिन और रात
धरती को कुतर-कुतर
रेपिस्ट
आदमी !!
एक बहुत बड़ा रेपिस्ट है
जो करता है
हर इक पल
धरती का स्वत्व-हरण
और देता है उसे
अपना गन्दा और
दुर्गंधमय अवशिष्ट-अपशिष्ट !!
.............!!
आदमी के अवशिष्ट से
कुम्भला और पथरा गई है धरती
और आदमी सोचता है
कि वही महान है !!
................!!
आदमी !!....सचमुच......
है तो बड़ा ही महान
और उसकी महानता
बिखरी पड़ी है
धरती के चप्पे-चप्पे पर.....!!
और बढती ही चली जा रही है
ये महानता...पल-दर-पल....
और बिचारी धरती....
सिकुड़ती ही चली जा रही है
इस महानता के बर-अक्श ....!!
और मजा यह कि
आदमी कभी अपने-आपको
रेपिस्ट समझता ही नहीं.....!!
वक्त
वक्त.....
इक छोटा-सा मगर
बड़ा ही शैतान-सा बच्चा है !!
जो हर समय
क्षणों की डाली से
लम्हों के फल
तोड़ता रहता है
कभी थकता ही नहीं !!
अपने आगे वक्त
अक्सर ख़ुद ही
छोटा पड़ जाता है !!
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