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Thursday, March 26, 2009

पापा मैं स्कूल नहीं जाउंगी.....!!


अभी-अभी अपनी छोटी बिटिया मौली को स्कूल छोड़कर रहा हूँ,जिसे दस दिनों पहले ही स्कूल में दाखिल किया है....उसकी उम्र ढाई साल है....और रोज--रोज स्कूल के दरवाजे पर पहुँचते ही इतना रोटी है कि उसे वापस घर ले आने को मन करता है....और तक़रीबन सारे ही बच्चे स्कूल के गेट के एब सम्मुख आते ही जोरों से चिंघाड़ मारना शुरू करते हैं....और सारा माहौल ही रुदनमय हो जाता है...कितनी ही माताओं की आँखे नम हो जाती हैं....और कुछ को तो मैंने बच्चों को छोड़कर गेट पर ही रोते हुए भी देखता हूँ....ख़ुद मेरी भी आँखे कुछ कम नहीं नम होती...मगर बच्ची को स्कूल जाना है तो जाना है...अब चाहे रोये...चीखे या चिल्लाए....अपना दिल काबू कर उसे रोता हुआ छोड़कर अपने को रोज वापस जाना होता है......!!
सवाल बच्चे द्वारा नई जिन्दगी की शुरुआत का नहीं है....मेरे लिए सवाल बच्चे की उम्र का है...जो दो से ढाई साल का है...यहाँ तक कि बहुत से शहरों में तो ग्यारह-ग्यारह महीनों के बच्चे भी स्कूल में लिए जा रहे हैं...और उनके कामकाजी माता-पिता कितनी राजी-खुशी उन्हें स्कूल छोड़कर बड़े आराम से अपने काम को रवाना हुए जा रहे हैं.... और फिर बच्चा स्कूल से वापस दाई या नौकर के साथ लौटता है....और फिर माँ-बाप के वापस लौटने तक उन्ही के साथ अकेला या किसी की किस्मत अच्छी हुई तो किसी पार्क आदि में खेलने का मौका मिल जाता है.... जबकि हमने शायद छः या सात साल में स्कूल का स्वाद चखा था...उस उम्र में में भी हम,मुझे याद आता है कि हम रोया करते थे....और कई बार मन नहीं करता था तो माँ-बाप हमें स्कूल जाने से रोक भी दिया करते थे....माँ-बाप द्बारा दिया गया यह प्रेम आज भी उनके प्रति अथाह सम्मान के रूप में हमारे ह्रदय में कायम है....और कभी भी हम उनकी अवज्ञा करने की हिमाकत नहीं करते....और जहाँ तक किसी समस्या पर अपने विचारों और दुनिया की वस्तुस्थिति से उनको अवश्य रु--रु कराते हैं.....अपने प्रेम को हमने अपनी माँ को इसी तरह समझाकर विवाह का जामा पहनाया था.....अलबत्ता झगडे तो कहाँ नहीं होते.....!!
लेकिन ये सब लिखने का कारण यह है कि ढाई साल से बच्चे से हम आख़िर चाहते क्या हैं....सवेरे इक बेहद ही गहरी और प्यारी नींद में सोये बच्चे को जबरन उठाना(ध्यान रहे कि उसकी उम्र कितनी है....!!!!!)और कभी धक्के मार कर कभी बहलाकर उसे तैयार करना....और रोते हुए ही उसे स्कूल को रवाना कर देना.....बेशक हम अपना अतीत नहीं देखते....हमने शायद सात साल की उम्र में पढ़ना शुरू किया....तो क्या हमारे ज्ञान में कोई कमी रह गई है....या किसी भी इंसान से हम कमतर इंसान हो गए हैं....!!
बच्चा अगर ढाई-तीन की उम्र से स्कूल ना जाकर चार-पाँच साल की उम्र में स्कूल जाए तो इसमें हर्जा क्या है.....??ये शुरू के बरस वो घर और उसके आस-पास खेलता रहकर और घर में ही खेलता-खाता हुआ बिना एग्जाम की जहमत उठाये हुए कुछ सीख-साख ले तो इसमें हर्जा क्या है.....??ढाई साल का इक बच्चा दुनियादारी कुछ सालों बाद ही सीख ले इसमें हर्जा क्या है.....??और अंत में एक बात यह भी कि हम अपने बच्चों से आख़िर चाहते क्या हैं.....????..........अपनी इच्छा से जो महत्वाकांक्षा उन्हें हम सौंपते है......आप मानिए या मानिए....जब वो कुछ बनने के लिए प्रोफेशनल बनाना शुरू करते हैं.....तो शायद उनकी नज़र में हम उनके माँ-बाप तो क्या,इक अजनबी से ज्यादा कुच्छ नहीं रह जाते....बेशक हम तब ता-जिन्दगी उनकी बेदर्दी को लेकर ता-जहाँ कलपते रहे...
जो हम रोपते हैं....वही हम पाते हैं.....हम बच्चे को ढाई साल से ही ख़ुद से दूर करना शुरू कर देते हैं....तो बच्चे से यह तनिक भी उम्मीद ना करे कि आने वाले समय में वो हमारे पास फटक पायेगा....या कि हमसे जुदा हुआ रह पायेगा....दोस्तों....बहुत-सी बातों पर हम विचार ही नहीं करते या सिर्फ़ विचार करके ही रह जाते हैं...उनके परिणामों की बाबत सोचना शायद हमारे बूते के बाहर होता है.....या किसी दबाव में हम जाते हैं.....जैसे अपनी ढाई साल की छोटी-सी बच्ची को डाला है मैंने स्कूल में अपनी घरवाली के दबाव में.....अपनी पिछली बच्ची प्राची की तरह......!!

Wednesday, March 25, 2009

मेरे पास कुछ आर्टिकल अंग्रेजी के हैं। मैं उनको हिन्दी में ट्रांसलेट करना चाहता हूं। ऐसा कोई सोफ्टवेयर या कन्वर्टर हो तो कृपया मेरी मदद करें।

मेरे पास कुछ आर्टिकल अंग्रेजी के हैं। मैं उनको हिन्दी में ट्रांसलेट करना चाहता हूं। ऐसा कोई सोफ्टवेयर या कन्वर्टर हो तो कृपया मेरी मदद करें। fmghosee@gmail.com

Saturday, March 21, 2009

जीवन क्या है...चलता-फिरता एक खिलौना है!!



जीवन क्या है...चलता-फिरता एक खिलौना है!!

"चीजें अपनी गति से चलती ही रहती है ...कोई आता है ...कोई जाता है ....कोई हैरान है ...कोई परेशां है.....कोई प्रतीक्षारत है...कोई भिक्षारत है...कोई कर्मरत है....कोई युद्दरत....कोई क्या कर रहा है ...कोई क्या....जिन्दगी चलती रही है ...जिन्दगी चलती ही रहेगी....कोई आयेगा...कोई जाएगा....!!!!""............जिन्दगी के मायने क्या हैं ....जिन्दगी की चाहत क्या है ....?? ""ये जिन्दगी....ये जिन्दगी.....ये जिन्दगी आज जो तुम्हारी ...बदन की छोटी- बड़ी नसों में मचल रही है...तुम्हारे पैरों से चल रही है .....ये जिन्दगी .....ये जिन्दगी ...तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है ....तुम्हारे लफ्जों में ढल रही है.....ये जिन्दगी....ये जिन्दगी...बदलते जिस्मों...बदलती शक्लों में चलता-फिरता ये इक शरारा ......जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ......इसी से सारी चहल-पहल है...इसी से रोशन है हर नज़ारा...... सितारे तोड़ो ...या सर झुकाओ...कलम उठाओ या .......तुम्हारी आंखों की रौशनी तक है खेल सारा...ये खेल होगा नहीं दुबारा ये खेल होगा नहीं दुबारा ......ये खेल होगा नहीं दुबारा......ये खेल होगा नहीं दुबारा.......!!"" ना जाने कब किसके ये शब्द पढ़े ...सुने थे ....मगर अब जिन्दगी की अमानत बन गए हैं ये शब्द ...अपने आप में इक दास्ताँ बन गए हैं ये शब्द ...!! पैदा होने के बाद जीना ही हमारी तयशुदा नियति है ...ये बात अलग है कि हम इसको किस तरह जीते हैं ..!!लड़-लड़ कर मर जाते हैं...या अपने आप को किसी ख़ास लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न कर देते हैं.....अपने स्वार्थों की पूर्ति में अपना जीवन होम कर देते हैं या अपने जीवन को ही इक वेदी बना लेते हैं.... चला तो किसी भी तरह से जा सकता है ...मगर ऐसे पथ बना जाना जो अनुकरणीय हों ... जो सबके लिए श्रद्धेय हों ....जो अंततः जीवन के समीचीन आदर्शो की गहराई को फ़िर-फ़िर से आंदोलित कर जाएँ ....जीना तो ऐसे भी है ..और वैसे भी ....और जीना कैसे है ....सिर्फ़ यही तो तय करना है हमको !!!!

Friday, March 20, 2009

प्यार के इस जज्बे को हमारा सलाम........!!

प्यार के इस जज्बे को हमारा सलाम.......!!

..............दोस्तों , सबसे पहले जैक ट्वीड के उस जज्बे को हमारा सलाम.......और सच कहूँ तो इन सब घटनाओं से हममें मानवता के प्रति फिर से विश्वास पैदा हो जाता है....वो विश्वास जो कम-से-कम प्रेम के अर्थों में हममे से पूरी तरह छीज चुका है.....और उसकी जगह अब हमेशा लिए एक वितृष्णा हममे जन्म ले चुकी है....दोस्तों.....ट्वीड भाई सचमुच इक मिसाल के रूप में हमारे सामने हैं....और जेड़ गुडी का साहस भी मौत पर उनके अटूट विश्वास को रेखांकित करता करता है.........जब मरना तय हो ही गया........तो रोना काहे का.......हंसते हुए क्यूँ ना मरा जाए....दोस्तों.....मैं कहना तो यही चाहता हूँ कि जब मरना तय है ही तो फिर जीकर ही क्यूँ ना मरा जाए.........आईये ना इसी बात पर हम सब जी लें........सच्चे इंसानों की तरह....जेड़ गुडी जी....ट्वीड जी...आप सबको हमारा बहुत-बहुत-बहुत प्रेम............!!.........दोस्तों.......आप ही बताओ ना क्या आप सब भी इंसान की तरह जीने को तैयार हो....??सबसे मोहब्बत करने......सबकी मदद करने को तैयार हो......??
इक प्रार्थना सुनी है मैनें........
लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
जिन्दगी शमां की सूरत हो खुदाया मेरी.....!!

Thursday, March 19, 2009

मुस्लिम मतदाता क्या सोचते है?


लोकसभा के चुनाव के आते ही मुस्लिम वोट्स की चर्चा होना आम बात है जैसा कि हम इससे पहले की पोस्ट में पढ़ चुके हैं कि मुस्लिम मतदाता राजनितिक दलों के लिए भेंड सामान हैं, वह सौ प्रतिशत सही है| कुछ सवाल और भी है जो सबके ज़ेहन में ज़रूर आते होंगे जैसे- "भारतीय मुस्लिम क्या सोचते है? कौन कौन से मुद्दे हैं जिनपर मुस्लिम मतदाता राजनितिक पार्टीज़ को वोट देंगे? क्या उनके मुद्दे वही होंगे जो बाकी दूसरे भारतीयों के होंगे या फिर उनके कुछ मख़सूस मुद्दे भी है? आदि"  

भारत में पिछले एक साल में राजनैतिक, सुरक्षा और सामाजिक स्थिति बहुत ज्यादा बदल गयी है, जिसके आधार पर कुछ कहना मुश्किल है, पिछले अनुमान पर कायम रहना भ्रम सा होगा | भारत में इस बीते साल में जो कुछ हुआ, उसकी वजह से हिन्दू और मुस्लिम के बीच टेंशन भी है | जो कुछ थोडी बहुत बची है वह वरुण गाँधी और अन्य साम्प्रदायिक नेता पूरी करे दे रहे है | 

सबसे ताज़ी बानगी तो नवम्बर 2008 में मुंबई में हुए हमले से बनती है जो कि पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैबा द्वारा प्रायोजित था | यह तो हमारा भाग्य ही था या हमारे देशवासियों की जागरूकता भरी सूझ बूझ कि किसी हिन्दू-मुस्लिम दंगे की कोई खबर ना ही मुंबई से या देश के किसी अन्य स्थान से आयी| वैसे मुंबई में जो हुआ उसका सीधा मक़सद था दोनों को आपस में लड़वाना | 

लेकिन सब कुछ ठीक रहा यह भी नहीं कहा जा सकता | जामिया नगर में मुस्लिम युवाओं का उत्पीड़न और पुलिस द्वारा मुठभेंड जो कि शक के दायरे में आ गयी थी और फ़र्जी थी | राजनितिक दबाव के चलते बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को मार डाला गया | इसके अलावा उत्तर भारत में शांति से रह रहे आजमगढ़ के निवासियों को प्रताडित करने से एक गुस्से और शिकायत की एक लहर मुस्लिम समाज में आ गयी थी | यह भी मुस्लिम समाज के बहुत शोक्ड सदमा है कि गुजरात के 2002 के पीडितों की समस्या जस की तस् है |  

भारत के लगभग सभी शहरों में अभी भी सुरक्षा की दृष्टि से उठाये गए सवालों की वजह से मुस्लिम की हालत भी ध्यान आकर्षित करती है | ज्यादातर शहरों में मुस्लिम को यह विश्वाश नहीं है, किसी भी तरह से विश्वाश नहीं है कि पुलिस उनसे सभ्य सुलूक करेगी |

मैं आपको एक सच्ची घटना बताता हूँ- मेरे एक दोस्त ने जो कि मुस्लिम था, पासपोर्ट कार्यालय से अपने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, उसका पासपोर्ट बन भी गया और डाकिया उसे डिलीवर करने उसके घर गया| पासपोर्ट देते समय उसने मेरे दोस्त से कहा- भैया ! बहरवा जाईके बम वम मत फोड़ दीहs , नाहीं तs हमर नौकरी चल जाई !" अब आप ही बताईये समाज में जो लहर है वह क्या सही है | 

दूसरा मुद्दा जो मुसलमानों के लिए अहम् है वह है कि सरकार या किसी भी राजनैतिक पार्टी का सच्चर कमिटी की सिफारिशों को लागू करने में नाकाम रहना | सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में भारत के मुसलमानों के हालत और उसके समाधान का पूरा इंतेज़ाम है | आज से दो साल पहले यह रिपोर्ट आयी थी और उसे आधे अधूरे मन से और निचले स्तर पर HR मंत्रालय पर काम हुआ लेकिन उसके बाद कोई भी एक्शन अभी तक नहीं लिया गया | यहाँ तक की सरकार इसे पार्लियामेंट में बहस के लिए भी नहीं ले गयी ना ही इसमें कुछ काम किया | 

ऊपर दिए गए मुद्दे क्या कम थे जो कुछ राजनैतिक पार्टियाँ भारत-अमेरिकी परमाणु करार को भी मुस्लिम मुद्दे से जोड़ने जैसा घृणित कार्य कर बैठीं | बेहद दुखद था कि उन्होंने इसे मुस्लिम विरोधी करार दिया था| इसी तरह के बेवजह के मुद्दों से कुछ कथित सेकुलर राजनैतिक पार्टियों अपने स्वार्थ और फायदे के लिए लगातार मुस्लिम वोट बटोरती आ रही हैं | 
 
ज्यादातर चुनाव में पार्टियाँ यह कोशिश करती है कि वह बड़े से बड़े पैमाने पर मुस्लिम्स' वोट्स बटोर लें और उसके लिए वह तरह तरह के हथकंडे अपनाती हैं और मुसलमानों की भावनाओं को टटोल कर अपने चुनावी वादे करती है जैसे- उर्दू को दूसरी भाषा बनाना, जुमे की नमाज़ को अटैंड करने के लिए स्कूल में आधे दिन की छुट्टी का ऐलान, मुसलमानों के पीर और औलियाओं की कब्र (मज़ार) पर जाना, कुछ मुस्लमान लीडर्स का पार्टियों द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रसंशा करना आदि!  

मुसलमान आज देख रहा है, राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों का ट्रैक रिकॉर्ड का अध्ययन कर रहा है कि उन्होंने ने मुस्लिम समुदाय के लिए क्या किया? उनके भले के लिए क्या किया और बुरे में क्या किया? उम्मीदवारों को इसी आधार पर तौला जायेगा, इस विधान सभा चुनाव में!!! आज यह मांग बहुत तेजी से उठ रही है कि वह पार्टी जो ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा मुस्लिम को दे वही वोट की हक़दार होगी|  

मुसलमान यह चाहते है कि उनसे पुलिस द्वारा अनुचित तरीके से मुसलमान होने की वजह से प्रताडित ना किया जाये या बेवजह उनके युवाओं को पुलिस उठा कर ना ले जाये और बाद में उस पर फर्जी आरोप लगा कर जेल भेज दे या आतंकी का ठप्पा लगा दे | उसे गुजरात जैसे हादसों का दुबारा सामना न करना पड़े | वह नज़र रख रहें हैं कि कौन सच्चर कमिटी की सिफारिशों को अमल में लायेगा, कौन मुसलमानों की बदहाली हो ख़तम करेगा, कौन मुसलमानों को सम्मान से जीने के लिए क़दम उठाएगा, कौन उसे दोयम के बजाये बराबर का समझेगा | वह चाहता है कि भारतीय समाज में उसे भी इज्ज़त से जीने के लिए ज़मीन, आसमान और आज़ादी चाहिए!  


देश के ज़्यादातर प्रदेशों में अन्य प्रदेशों के समान ही आधार हैं जिन से यह तय होगा कि वह किसे वोट देंगी | लेकिन अन्य मुद्दों पर मुसलमानों के वोट्स उधर ही जायेंगे जिधर दुसरे भारतीय के जैसे - मुस्लिम दलित मुद्दा, यह मुद्दा हिन्दू दलित और ईसाई दलित के समान ही है | मुस्लिम OBC मुद्दा- यह मुद्दा हिन्दू OBC और ईसाई OBC के समान ही है| निम्न आय वर्ग में गरीब मुस्लिम का वोट भी वहीँ जायेगा जहाँ गरीब हिन्दू या गरीब ईसाई या दुसरे गरीबों का जायेगा | गरीब तो यह देखेंगे (चाहे वो कोई हों) कि कौन उनके infrastructure को संवारेगा और उनके लोकेलिटी को ऊपर उठने मौक़ा देगा| कोंग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रिय स्तर की पार्टियों में मुस्लिम की दिलचस्पी का ग्राफ कम होता जा रहा है और उनका वोट स्थानीय पार्टियों हथियाती जा रहीं है जिनमे प्रमुख हैं- समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रिय जनता दल, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, DMK, AIDMK आदि|
"भारत का मुसलमान उन्हें पार्टियों द्वारा हांथों हाँथ लिए जाने और लुभावने वादों आदि से अब सतर्क हो चूका है | इसके बजाये वह देख रहा है उसके साथ साफ़-सुथरा और समानता का व्यवहार ! किसी और चीज़ से ज़्यादा मुस्लिम्स उसे वोट देने के लिए अधिक झुकेंगे जो भारत में secular democratic structure को genuinely promote करेगा, ठीक उसी तरह से जैसे मुग़ल काल के बादशाहों के समय में था जिन्होंने एक हज़ार साल भारत देश पर एकछत्र शक्तिशाली शासन करने के बाद भी हिन्दू मुस्लिम सौहार्द बरक़रार रखा !"

सलीम खान 
संरक्षक 
स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़  
लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

Wednesday, March 18, 2009

मौत का एक दिन मुअयन्न है...........!!

जिन्दगी किसके साथ किस प्रकार का खेल खेलती है...यह किसी को भी नहीं पता...अलबत्ता खेल पूरा हो चुकने के बाद हमारा काम उसपर रोना-पीटना या हंसना-खिलखिलाना होता है...किस बात का क्या कारण है...हमारे जिन्दा रहने या अकाल ही मर जाने का रहस्य क्या है....यह भी हम कभी नहीं जान सकते....हम सिर्फ चीज़ों को देख सकते हैं...गर सचमुच ही हम चीज़ों को गहराई से देख पाते हों....तो किसी की भी....किसी भी प्रकार की मौत हमारे इंसान होने के महत्त्व को रेखांकित कर सकती है....क्या हम सच में इस बात समझ सकने के लिए तैयार हैं......?????
.........जेड गुडी ही क्यों....किसी भी कोई भी इंसान किसी भी दुसरे इंसान की तरह ही उतना ही महत्वपूर्ण है....अपनी अर्थवत्ता और अपने महत्त्व को इतना सभ्य.... ..इतना शिक्षित....इतना विवेकशील कहलाने वाला इंसान भी नहीं समझता और तमाम तरह के दुर्गुणों....लालचों.....व्यसनों....और अन्य बुराईयों में जानबूझकर जकडा हुआ रहता है....
हर वक्त किसी से भी झगड़ने को तैयार रहता है....और तरह-तरह के नामों के खांचे में खुद को सीमित कर तरह-तरह की लडाईयाँ लड़ता रहता है....!!
............आखिर क्या बात है.....??.....आखिर इंसान को चाहिए तो आखिर क्या चाहिए.....???....कितना कुछ उसके शरीर के और मन के पेट भरने को काफी है...??.... सच तो यह है.....की हम पाते हैं कि कितना भी कुछ इंसान को क्यूँ ना मिल जाए....उसकी हवस उसको मिले कुल सामान से "द्विगुणित" हो जाती है....हमारे चारों और तरह-तरह के जेड़ गुडी बिखरे पड़े हैं....जो विभिन्न तरह के कैंसरों से लड़ते-लड़ते जीते-जी मर रहे हैं....और अंततः जिन्दगी की तमाम जंग हार जा रहे हैं...जो मीडिया में है...या जो मीडिया को दिखाई पड़ता है...सिर्फ उतनी ही यह धरती नहीं है....और ना ही उतने ही धरती के दुखः......!!
...........हम सब....या हममे से कुछ लोग भी अगर बेहतर इंसान होने का मदद अपने भीतर भर लें.....तो समाज के बहुत तरह के कैंसर एक क्षण में दूर हो सकते हैं...क्या हम एक बेहतर इंसान बनाने को तैयार हैं.....??क्या हम अपने कर्तव्यों को समझते हैं....??क्या हम समझ पाने को व्याकुल हैं कि धरती को सच्चे इंसानों की बहुत से समय से तलाश है...??क्या हम समस्त इंसानों की थोडी सी खुशियों के लिए अपने थोड़े से स्वार्थों की तिलांजलि देने को तैयार हैं....??...................याद रखे धरती हमें यह नहीं कहती कि हम दुखी हो जाएँ....बस इतना ही चाहती है कि हम अपने थोड़े से सुखों को किसी और को सौंप दें.....और इसमें बड़ा मज़ा आता है....हमारे अपने सुखों से कहीं बहुत ही ज्यादा....सच....हाँ दोस्तों मैं बिलकुल सच ही कह रहा हूँ.....सिर्फ इक बार आजमा कर देखें ना....बार-बार आजमाने को जी चाहेगा...सच....सच...सच.....हाँ सच.....!!!!
................बाकी मौत का तो एक दिन मुअयन्न है ही......है ना...........????